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________________ ३२४ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार भागो । ९७ णवरि सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणमुकस्सडिदिसंकमो केवचिरं कालादो होदि १९८. जहणेण एयसमओ । ९९. उक्कस्सेण आवलियाए असंखेज्जदिभागो' । १००. तो जहण्णयं । १०१. सव्वासि पयडीणं जहण्णट्ठिदिसंकमो केवचिरं कालादो होदि ११०२. जहण्णेणेयसमओ । १०३. उक्कस्सेण संखेज्जा समया । १०४. वरि अणंताणुबंधीणं जहण्णट्ठिदिसंकमो के चिरं कालादो होदि १ १०५. जहणेण एयसमओ । १०६. उक्कस्सेण आवलियाए असंखेज्जदिभागो । १०७ इत्थि - णकुंसयवेदछण्णोकसायाणं जहण्णट्ठिदिसंकमो केव चिरं कालादो होदि ११०८. जहष्णुकस्सेणंतो मुहुत्तं । १०९. एत्थ सण्णियासो कायव्वो । ११०. अप्पा बहुअं । १११. सच्चत्थोवो णवणोकसायाणमुकस्सडिदिसंकमों । प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व के उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणका कितना काल है ? जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल आवलीके असंख्यातवें भागप्रमाण है ।। ९५-९९॥ चूर्णिसू (० - अब इससे आगे नाना जीवोकी अपेक्षा जघन्य स्थितिसंक्रमणकालको कहते हैं ॥ १०० ॥ शंका - सर्व प्रकृतियो के जघन्य स्थितिसंक्रमणका कितना काल है ? ॥१०१॥ समाधान - सर्व प्रकृतियोके जघन्य स्थितिसंक्रमणका जधन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल संख्यात समय है । विशेषता केवल यह है कि अनन्तानुवन्धी चारो कषायोके जघन्य स्थितिसंक्रमणका कितना काल है ? जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल आवलीके असंख्यातवे भागप्रमाण है ।।१०२-१०६॥ शंका- स्त्रीवेद, नपुंसकवेद और हास्यादि छह नोकपायोके जघन्य स्थितिसंक्रमणका कितना काल है ? ॥ १०७ ॥ समाधान- इन सूत्रोक्त प्रकृतियोंके जघन्य स्थितिसंक्रमणका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥१०८॥ चूर्णिसू० - यहॉपर स्थितिसंक्रमणका सन्निकर्ष करना चाहिए || १०९ || विशेषार्थ-स्थितिसंक्रमण सम्बन्धी सन्निकर्पकी प्ररूपणा स्थितिविभक्तिके सन्निकर्पके समान है । जहाँ कही कुछ विशेषता है, वह जयधवला टीकासे जानना चाहिए । चूर्णिसू० (० - अब स्थितिसंक्रमणका अल्पबहुत्व कहते हैं- नव नोकपायोका उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमण सबसे कम है । नोकपायोके उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणसे सोलह कपायोका उत्कृष्ट १ एयवारमुवक्कताणमेयसमओ चेव लब्भइ ति तमेयसमय ठविय आवलियाए असखेज्जदिभागमेत चकमणवारेहि णिरतर मुवलग्भमाणसरूवेहि गुणिदे तदुवलभो होड़ | जयध० २ खवणाए लद्वजहण्णभावाण तदुवलभादो | जयध० ३ चरिमट्ठिदिखडयम्मि लद्वजहण्णभावाण तदुवलंभादो | णवरि जहण्णकालदो उकस्सकालस्स संखेज्जगुणत्तमेत्थ दट्ठव्व, संखेज्जवार तदणुसधाणावलवणे तदविरोहादो । जयध‍ ४ एदस्स पमाणं वधसंकमणोदयावलियाहि परिहीणचालीससागरोवमकोडाकोडीमेत्त । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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