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________________ गा० ५८] स्थितिसंक्रम-काल-निरूपण ३२३ ८८. णाणाजीवेहि भंगविचओ दुविहो उक्कस्सपदभंगविचओ च जहण्णपदभंगविचओ च । ८९. तेसिमट्ठपदं काऊण उक्कस्सओ जहा उकस्सद्विदिउणीरणा तहा कायव्वा । ९०. एत्तो जहण्णपदभंगविचओ। ९१. सव्वासि पयडीणं जहण्णहिदिसंकामयस्स सिया सव्चे जीवा असंकामया, सिया असंकामया च संकामओ च, सिया असंकामया च संकामया च । ९२. सेसं विहत्ति-भंगो। ९३. णाणाजीवेहि कालो । ९४. सव्वासि पयडीणमुक्कस्सहिदिसंकमो केवचिरं कालादो होदि १ ९५.जहण्णेण एयसमओ । ९६.उकस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिमुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्धपुद्गलपरिवर्तन है ।।८२-८७॥ चूर्णिसू०-नाना जीवोकी अपेक्षा भंगविचय दो प्रकार है-उत्कृष्टपद-भंगविचय और जघन्यपद-भंगविचय । उनका अर्थपद करके जिस प्रकार उत्कृष्ट स्थिति-उदीरणाकी प्ररूपणा की गई है, उसी प्रकारसे उत्कृष्टपद-भंगविचयकी प्ररूपणा करना चाहिए ।।८८-८९॥ विशेषार्थ-वह अर्थपद इस प्रकार है-जो जीव उत्कृष्ट स्थितिके संक्रामक होते हैं, वे जीव अनुत्कृष्ट स्थितिके असंक्रामक होते हैं। और जो जीव अनुत्कृष्ट स्थितिके संक्रामक होते है, वे उत्कृष्ट स्थितिके असंक्रामक होते है। चूर्णिसू०-अब इससे आगे जघन्यपद-भंगविचयकी प्ररूपणा की जाती है-मोहनीय कर्मकी सभी प्रकृतियोंकी जघन्य स्थिति-संक्रमणके कदाचित् सर्व जीव असंक्रामक होते है, कदाचित् अनेक असंक्रामक और कोई एक संक्रामक होता है, कदाचित् अनेक जीव असंक्रामक और अनेक जीव संक्रामक होते है ॥९०-९१॥ चूर्णिसू०-स्थिति-संक्रमणके शेष भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र और स्पर्शन अनुयोगद्वारोंकी प्ररूपणा स्थितिविभक्तिके समान जानना चाहिए ॥९२॥ चूर्णिसू०-अब नाना जीवोकी अपेक्षा स्थितिसंक्रमणके कालका निरूपण करते हैं ॥९३॥ शंका-सर्व प्रकृतियोके उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणका कितना काल है ? ॥९४॥ समाधान-सर्व प्रकृतियोके उत्कृष्ट स्थितिसंक्रमणका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असंख्यातवें भाग-प्रमाण है। विशेषता केवल यह है कि सम्यक्त्वविसजुत्त सजुत्तकालेहि अतरिय पुणो वि विसजोयणाए कादुमाढत्ताए चरिमफालिविसए लद्धमतोमुहुत्त १ तत्थुक्कस्सपदभगविचओ णाम उक्स्सद्विदि-सकामयाण पवाहवोच्छेदसभवासभवपरिक्खा । तहा जहण्णो वि वत्तव्यो । जयध० २ एगसमयमुक्कस्सििदं सकामेदूण विदियसमए अणुक्कस्सछिदि सकामेमाणएसु णाणाजीवेसु तदुवलभादो। जयध० ___ ३ एत्थ मिच्छत्त-सोलसकसाय-भय-दुगुछ-णउसयवेद-अरइ-सोगाणमुक्कस्सटिठदिवधगद्ध ठविय आवलियाए असखेजभागमेत्ततदुवक्कमणवारसलागाहि गुणिदे उक्कस्सकालो होइ। हस्स-रइ-इत्थि-पुरिसवेदाणमावलियं ठविय तदसखेज्जमागेण गुणिदे पयदुक्कस्सकालसमुप्पत्ती वत्तव्वा । जयध० होइ | जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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