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________________ गा० ५८] स्थितिसंक्रम-स्वामित्व-निरूपण ३२१ चेव अपच्छिमहिदिखंडयं चरिमसमयसंछुहमाणयस्स जहण्णयं । ६४. कोहसंजलणस्स जहण्णढिदिसंकमो कस्स ? ६५. खवयस्स कोहसंजलणस्स अपच्छिमहिदिबंधचरिमसमयसंछुहमाणयस्स तस्स जहण्णयं । ६६. एवं माणमायासंजलण-पुरिसवेदाणं। ६७. *लोभसंजलणस्स जहण्णहिदिसंकमो कस्स ? ६८. आवलियसमयाहियसकसायस्स खवयस्स । ६९. इत्थिवेदस्स जहण्णहिदिसंकमो कस्स ? ७०. इत्थिवेदोदयक्खवयस्स तस्स अपच्छिमट्टिदिखंडयं संछुहमाणयस्स तस्स जहणणयं । ७१. णवंसयवेदस्स जहण्णद्विदिसंकमो कस्स ? ७२. णqसयवेदोदयक्खवयस्स तस्स समाधान-इन्ही आठ मध्यम कपायोके अन्तिम स्थितिकांडकको चरम समयमे संक्रमण करनेवाले क्षपकके उक्त आठों कषायोका जघन्य स्थितिसंक्रमण होता है ॥६३॥ शंका-संज्वलनक्रोधका जघन्य स्थितिसंक्रमण किसके होता है ? ॥६४॥ समाधान-संज्वलनक्रोधके उद्यके साथ क्षपकश्रेणीपर चढ़े हुए जीवके संज्वलनक्रोधके अन्तिम स्थितिबद्ध द्रव्यको चरम समयमे संक्रमण करनेवाले क्षपकके संज्वलनक्रोधका जघन्य स्थितिसंक्रमण होता है ॥६५॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार संज्वलनमान, माया और पुरुषवेदके जघन्य स्थितिसंक्रमणका स्वामित्व जानना चाहिए ॥६६॥ शंका-संज्वलनलोभका स्थितिसंक्रमण किसके होता है १ ॥६७॥ समाधान-एक समय अधिक आवलीकालवाले सकपाय अर्थात् दशम गुणस्थानवर्ती क्षपक जीवके संज्वलनलोभका जघन्य स्थितिसंक्रमण होता है ॥६८॥ शंका-स्त्रीवेदका जघन्य स्थितिसंक्रमण किसके होता है ? ॥६९॥ समाधान-स्त्रीवेदके उदयसे श्रेणी चढ़नेवाले क्षपकके जब स्त्रीवेदके अन्तिम स्थितिकांडकका संक्रमण होता है, तब उसके स्त्रीवेदका जघन्य स्थितिसंक्रमण होता है ॥७॥ शंका-नपुंसकवेदका जघन्य स्थितिसंक्रमण किसके होता है ? ॥७१॥ समाधान-नपुंसकवेदके उदयके साथ श्रेणी चढ़नेवाले क्षपकके जव नपुंसकवेदके अन्तिम स्थितिकांडकका संक्रमण होता है, तब उस जीवके नपुंसकवेदका जघन्य स्थितिसंक्रमण होता है ॥७२॥ १ सोदएणेव चढिदस्स खवयस्स कोधवेदगद्धाचरिमसमयणवकवधमावलियादीद सकामेमाणयस्स समयूणावलियमेत्तफालीओ गालिय चरिमफालि सकामणे वावदस्स कोहसंजलणस्स जहण्णओ ठिदिसकमो होइ त्ति । जयध० २ समउत्तरालियाए लोभे सेसाइ सुहमरागरस । चूणिः-सुहुमए रागे समयाधियावलियसेसे वट्टमाणो लोभस्स जण्णिय ट्ठिति सकामेति । __ कम्मप० सक० गा० ४२ * ताम्रपत्रवाली प्रतिमे 'लोम' पदके स्थानपर 'तेणेह' पाठ मुद्रित है, (देखो पृ० १०६३) । पता नहीं, इस पदको किस आधारपर दिया गया है ? प्रकरणके अनुसार 'लोभ' पद होना आवश्यक है। ४१
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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