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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार ५३. जहण्णयमेयजीवेण सामित्तं कायव्वं । ५४. मिच्छत्तस्स जहण्णओ डिदिसंकमो कस्स १५५. मिच्छत्तं खवेमाणयस्स अपच्छिमट्ठिदिखंडयचरिमसमय संकामय स्स तस्स जहण्णयं । ५६. सम्मत्तस्स जहण्णविदि संकमो कस्स १५७ समयाहियावलियअक्खीणदंसणमोहणीयस्स । ५८. सम्मामिच्छत्तस्स जहणडिदिसंकमो कस्स १५९. अपच्छिमडिदिखंडय चरिमसमय संछुहमाणयस्स तस्स जणयं । ६० अणंताणुबंधीणं जहण्णट्ठिदिसंकमो कस्स ? ६१. विसंजोएंतस्स तेसिं चेव अपच्छिमडिदिखंडय - चरिमसमयसंकाय' । ६२. अडण्हं कसायाणं जहण्णट्ठि दिसंकयो कस्स १६३. खवयस्स तेसिं ३२० अव एक जीवकी अपेक्षा जघन्य स्थितिसंक्रमका स्वामित्व वर्णन करना चाहिए ॥ ५३ ॥ शंका- मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? ॥ ५४ ॥ समाधान - मिथ्यात्वको क्षपण करनेवाले जीवके अन्तिम स्थितिको कके अन्तिम समयवर्ती द्रव्यके संक्रमण करनेपर उसके मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम होता है ॥ ५५ ॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? ॥ ५६ ॥ समाधान-एक समय अधिक आवलीकाल जिसके दर्शनमोहनीयकर्मके क्षय होनेमे अवशिष्ट रहा है, ऐसे जीवके सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य स्थितिसंक्रम होता है || ५७ || शंका-सम्यग्मिथ्यात्वका जघन्य स्थितिसंक्रम किसके होता है ? ॥ ५८ ॥ समाधान- सम्यग्मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिकांडकको चरम समय में संक्रमण करनेवाले जीवके सम्यग्मिथ्यात्वका जवन्य स्थितिसंक्रमण होता है ॥५९॥ शंका- अनन्तानुवन्धी कपायोका जघन्य स्थितिसंक्रमण किसके होता है ? ॥ ६० ॥ समाधान- अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करनेवाले जीवके उन्ही कपायोके अन्तिम स्थितिकांडक के चरम समयमे संक्रमण करनेपर अनन्तानुवन्धी कपायोका जवन्य स्थितिसंक्रमण होता है ॥ ६१॥ शंका- अप्रत्याख्यानावरणादि आठ मध्यम कपायोंका जघन्य स्थितिसंक्रमण किसके होता है ? ॥ ६२ ॥ १ समयाहिगालिगाए सेसाए वेयगस्स कयकरणो । सक्खवग-चरमखंडगसंघुमणे टिडिमोहाणं ॥ ४१ ॥ चूर्णिः -- दसणमोहखवगस्स मिच्छत्त सम्मामिच्छत्ते खवेत्तु सम्मत्तं सव्वोवट्टणार ओवट्टेत्तण वंदेमाणस्स चतुगतिगस्स अष्णयरस्स समयाहियावलियाए सेसाए पवट्टमाणस्स जहण्णगो टितिसकमो । तत्तो पर खाइयसम्म दिट्टी होस्सति । 'कयकरणो 'त्ति खवणकरणे वट्टमाणो चेव । वैदगसम्मत्तस्स उत्त | मिच्छत्तसम्मामिच्छत्ताण भण्णइ - 'सखवगच रिसखडगसछु भणा दिट्टिमोहाणति, मिच्छत्त सम्मामिच्छत्ताण अप्पप्पणी खवणचरिमखडगे वट्टमाणो मणुओ अविरतसम्मादिट्ठी देसविरतो वा विरतो वा जहण ठितिसकामगो लव्मति | कम्मप० स० २ पढमकसायाण विसंजोयणसंछोभणाए उ ॥ ४२ ॥ चूर्णिः - 'पढमकसाया' इति अनंताणुबंधी, विसजोयण विणासण । अनंताणुबंधीण अप्पणी खवणयाले चरिमसकामणे वमाणो अण्णदरो चतुगतिगो सम्मदिट्टी सामी । कम्मर० स०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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