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________________ उप्कर्षणापकर्षण-अर्थपद-निरूपण गा० ५८] ३१५ १७. तदो सव्वत्थोवो जहण्णओ णिक्खेवो' । १८. जहणिया अइच्छावणा दुसमयूणा दुगुणा १९. णिव्याघादेण उक्कस्सिया अइच्छावणा विसेसाहिया । २०. वाघादेण उक्कस्सिया अइच्छावणा असंखेज्जगुणा । २१. उक्कस्सियं द्विदिखंडयं विसेसाहियं । २२. उक्कस्सओ णिक्खेवो विसेसाहिओं । २३. उक्कस्सओ द्विदिबंधो विसेसाहिओ। २४. जाओ वझंति द्विदीओ तासिं द्विदीणं पुव्वणिबद्धहिदिमहिकिच्च णिव्याघादेण उक्कड्डणाए अइच्छावणा आवलिया । २५. एदिस्से अइच्छावणाए आवलियाए असंखेज्जदिभागमादि कादण जाव उकस्सओ णिक्खेवो त्ति णिरंतरं अब चूर्णिकार जघन्य-उत्कृष्ट अतिस्थापना और निक्षेप आदिका प्रमाण अल्पबहुत्वद्वारा बतलाते है चूर्णिसू ०-वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा जघन्य निक्षेप सबसे कम है । जघन्य निक्षेपसे जघन्य अतिस्थापना दो समय कम दुगुणी है। जघन्य अतिस्थापनासे निर्व्याघातकी अपेक्षा उत्कृष्ट अतिस्थापना विशेप अधिक है । निर्व्याघातकी अपेक्षा उत्कृष्ट अतिस्थापनासे व्याघातकी अपेक्षा उत्कृष्ट अतिस्थापना असंख्यातगुणी है। व्याघातकी अपेक्षा उत्कृष्ट अतिस्थापनासे उत्कृष्ट स्थितिकांडक विशेष अधिक है । उत्कृष्ट स्थितिकांडकसे उत्कृष्ट निक्षेप विशेष अधिक है। उत्कृष्ट निक्षेपसे उत्कृष्ट स्थितिबन्ध विशेष अधिक है ।।१७-२३॥ इस प्रकार अपवर्तनाकी अपेक्षा स्थितिसंक्रमकी प्ररूपणा करके अब उद्वर्तनाकी अपेक्षा स्थितिसंक्रमकी प्ररूपणा करते है चूर्णिसू०-जो स्थितियाँ बंधती है, उन स्थितियोकी पूर्व निवद्ध स्थितिको लेकर निर्व्याघातकी अपेक्षा उद्वर्तना करनेपर अतिस्थापना आवलीप्रमाण होती है। इस अतिस्थापनाका जघन्य निक्षेप आवलीके असंख्यातवें भाग है। इस जघन्य निक्षेपस्थानको आदि करके एक-एक समयकी वृद्धि करते हुए उत्कृष्ट निक्षेप प्राप्त होने तक निरन्तर निक्षेपस्थान पाये जाते है ॥२४-२५॥ १ कुदो, आवलियतिभागपमाणत्तादो । जयध० २ जण्णाइच्छावणा णाम आवलिय वे-तिभागा | तदो तत्तिभागादो वे-तिभागाण दुगुणत्त होउ णाम, विरोहाभावादो । कथ पुण दुसमयूणत्त ? उच्चदे ? आवलिया णाम कदजुम्मसखा । तदो तिभाग सुद्ध ण हवेदि त्ति रूवमवणिय तिभागो घेत्तव्यो, तत्थावणिदरूवेण सह तिभागो जहण्णणिक्खेवो, वे-तिभागा अइच्छावणा । एदेण कारणेण समयाहियतिभागे दुगुणिदे जहण्णाइच्छावणादो दुरूवाहियमुप्पजइ, तम्हा दुसमयूणा त्ति सुत्ते वृत्त । जयध० ३ को णिव्याघादो णाम ? ठिदिखंडयघादस्साभावो । जयध० ४ केत्तियमेत्तेण ? समयाहियदुभागमेत्तेण । जयेध ५ कुदो, अतोकोडाकोडीपरिहीणकम्मठिदिपमाणत्तादो । जयध० ६ अग्गठ्ठिदीए वि एत्थ पवेसदसणादो। ७ कुदो उक्करसठिदि बधिय वधावलिय वोलाविय अग्गछिदिमोकड्डिऊणावलियमेत्तमहच्छाविय उदयपज्जत णिक्खिवमाणस्त समयाहियदोआवलियूणकम्मठिदिमेत्तुक्कस्सणिक्खेवसभवोवलभादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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