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________________ ३१४ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार १०. वाघादेण अइच्छावणा एका जेणावलिया अदिरित्ता होइ। ११. तं जहा । १२. हिदिघादं करेंतेण खंडयमागाइदं । १३. तत्थ जं पहमसमए उकीरदि पदेसग्गं तस्स पदेसग्गस्स आवलियाए अइच्छावणा । १४. एवं जाव दुचरिमसमयअणुकिण्णखंडयं ति । १५. चरिमसमए जा खंडयल्स अग्गहिदी तिस्से अइच्छावणा खंडयं समयूणं । १६. एसा उक्कस्सिया अइच्छावणा वाघादे । समय इन सबको मिलानेपर उत्कृष्ट निक्षेपका प्रमाण दो आवली और एक समयसे कम सत्तरकोड़ाकोड़ी सागरोपम सिद्ध होता है । जघन्य निक्षेपका प्रमाण एक समय अधिक आवलीका त्रिभाग है । उत्कृष्ट अतिस्थापनाका प्रमाण एक आवली और जघन्य अतिस्थापनाका प्रमाण एक समय कम आवलीके दो त्रिभागमात्र जानना चाहिए । अपवर्त्यमान स्थितिके फर्म-प्रदेश निक्षेप-कालान्तर्गत स्थितियोमे किस क्रमसे निक्षिप्त किये जाते है, इसके लिए बताया गया है कि उदयवाले समयमे सबसे अधिक कर्मप्रदेश दिये जाते है और उससे परवर्ती समयोमे उत्तरोत्तर विशेप हीनके क्रमसे अतिस्थापनावली प्राप्त होने तक दिये जाते है । निर्व्याघातकी अपेक्षा अपवर्तनाद्वारा स्थितिसंक्रम किस प्रकारसे होता है, इस वातको वताकर अब चूर्णिकार व्याघातकी अपेक्षा स्थितिसंक्रमकी प्ररूपणा करते हैं चूर्णिसू०-व्याघातकी अपेक्षा एक प्रमाणवाली अतिस्थापना होती है, जिससे कि आवली अतिरिक्त है । वह इस प्रकारसे जानना चाहिए-स्थितिघातको करनेवाले के द्वारा जो स्थितिकांडक ग्रहण किया गया है, उसमे जो प्रदेशाग्र प्रथम समयमे उत्कीर्ण ( अपवर्तित ) किया जाता है, उस प्रदेशाग्रकी एक आवलीके प्रमाण अतिस्थापना होती है। जो प्रदेशाग्र द्वितीय समयमे उत्कीर्ण किया जाता है, उसकी अतिस्थापना भी एक आवली-प्रमाण होती है । इस प्रकार द्विचरम-समयवर्ती अनुत्कीर्ण स्थितिकांडक तक ले जाना चाहिए । चरम समयमे कांडककी जो अनस्थिति है, उसकी अतिस्थापना एक समय कम कांडक-प्रमाण होती है। यह उत्कृष्ट अतिस्थापना व्याघातके विषयमे जानना चाहिए ।। १०-१६॥ विशेषार्थ-व्याघात नाम स्थितिघातका है। जब स्थितियोका अपवर्तन स्थितिकांडकघातके रूपसे होता है, तव उत्कृष्ट अतिस्थापनाका प्रमाण सर्वोपरिम समयवर्ती स्थितिकी अपेक्षा एक समय कम स्थितिकांडकके प्रमाण होता है । इस स्थितिकांडकका भी प्रमाण अन्तःकोड़ाकोड़ी सागरोपमसे हीन सत्तर कोडाकोड़ी सागरोपम है । सर्वोपरिम समयके अतिरिक्त अन्य सव उत्कीर्ण ( अपवर्तित ) होनेवाली स्थितियोकी अतिस्थापनाका प्रमाण एक आवली ही है। १ जेण छिदिघाद करतेण ट्ठिदिकडयमागाइद, तस्स वाघादेणुक्कस्सिया अइच्छावणा आवलियादिरित्ता होइ त्ति सुत्तत्यसंबंधो। जयध० २ कुदो, तम्मि समए टिछदिखडयं तब्भाविणोण सव्वासिमेव ठिदीणं वाघादेण हेट्ठा घाददंसणादो। Xxxकुदो समयूणत्त ? अग्गठ्दिीए ओकड्डिनमाणीए अच्छावणावहिन्भावदसणाटो । जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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