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________________ ३१३ गा० ५८ उत्कर्षणापकर्षण-अर्थपद-निरूपण अतिस्थापनासे किया गया है। आवाधाकाल व्यतीत होनेके पश्चात् जिस क्षणमे विवक्षित कर्मके प्रदेश उदयमे आते हैं, उस समयसे लगाकर एक आवली तकके कालको उदयावली कहते हैं । इस उदयावलीके अन्तर्गत जितनी भी स्थितियाँ है, वे न घटाई जा सकती है, न बढ़ाई जा सकती हैं और न अन्य प्रकृतिरूपसे परिवर्तित ही की जा सकती है, इसीलिए उदयावली. को 'अपवर्तना, उद्वर्तना आदि सभी करणोके अयोग्य' कहा जाता है । उदयावलीके बाहिर अनन्तर समयवर्ती जो एक समयमात्र प्रथमस्थिति है उसके प्रदेश उदयावलीमे निक्षिप्त होते हैं । उदयावलीके असंख्यात समय होते है, उनको कहाँ निक्षिप्त करे, इसके लिए उदयावलीके समयोमेसे एक कम करके उसे तीनसे भाजित करना चाहिए । इन तीन भागोमेंसे एक समय अधिक प्रथम विभागमे उस विवक्षित स्थितिके प्रदेशोको निक्षिप्त किया जाता है, अतएव इस विभागको निक्षेप कहा जाता है । अन्तिम दोनो विभागोमे वे प्रदेश निक्षिप्त नहीं किये जाते, किन्तु उन्हे अतिक्रमण करके प्रथम विभागमे स्थापित किया जाता है, इसलिए उन दोनो त्रिभागोको अतिस्थापना कहते है । इस प्रकार जघन्य निक्षेपका प्रमाण आवलीका एक समयसे अधिक एक त्रिभाग है और जघन्य अतिस्थापनाका प्रमाण आवलीके शेष दो त्रिभाग है। जब उदयावलीसे उपरितन द्वितीय समयवर्ती स्थिति अपवर्तित की जाती है, तब निक्षेपका प्रमाण एक समय अधिक हो जाता है । जव उदयावलीसे उपरितन तृतीय स्थितिका अपकर्षण किया जाता है, तब निक्षेपका प्रमाण तो वही रहता है, किन्तु अतिस्थापनाके प्रमाणमे एक समय और अधिक हो जाता है । इस प्रकार क्रमशः एक-एक समयवाली उत्तरोत्तर स्थितियोको तबतक अपवर्तित करते जाना चाहिए, जब तक कि एक-एक समय बढ़ते हुए अतिस्थापनाका प्रमाण पूरा एक आवलीप्रमाण न हो जाय । दूसरे शब्दोमे इसे इस प्रकारसे भी कह सकते है कि उदयावलीसे उपरितन-स्थित एक आवलीके त्रिभागप्रमाण स्थितियोके अपवर्तन करनेपर अतिस्थापनाका प्रमाण पूर्ण एक आवली हो जाता है। अतिस्थापनाके एक आवलीप्रमाण होने तक निक्षेपका वही पूर्वोक्त प्रमाण रहता है । इसके पश्चात् उपरितन स्थितियोके अपवर्तित करनेपर अतिस्थापनाका प्रमाण तो सर्वत्र एक आवली ही रहता है, किन्तु निक्षेपका प्रमाण प्रतिसमय बढ़ता जाता है । इस प्रकार एक-एक समयरूपसे बढ़ते हुए निक्षेपका प्रमाण कहाँ तक बढ़ता जाता है, इस प्रश्नका उत्तर यह है कि दो आवली और एक समयसे कम कर्मस्थितिके काल तक बढ़ता जाता है । कर्मस्थितिका काल सत्तर कोड़ाकोड़ी सागरोपम है । उसमें दो आवली और एक समय कम करनेका कारण यह है कि बन्धावली जबतक न बीत जाय, तवतक तो कर्मस्थितिका अपवर्तन किया नही जा सकता । और जब सबसे ऊपरी अन्तिम स्थितिका अपवर्तन किया जाता है, तब आवली-प्रमाण जो अतिस्थापना है उसे छोड़कर उससे नीचेकी स्थितियोमे उसके द्रव्यको निक्षिप्त किया जायगा। अतः अतिस्थापनान्तर्गत स्थितियोका भी अपवर्तन नहीं होता है । तथा जिस सर्वोपरितन स्थितिका अपवर्तन किया जा रहा है, उसे भी छोड़ना पड़ता है । इस प्रकार वन्धावली, अतिस्थापनावली और सर्वोपरितनस्थितिका
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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