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________________ कसाय पाहुउँ सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार द्विदी तिस्से वि तत्तिगो चेव णिक्खेवो । अइच्छावणा समयुत्तरा'। ८. एवमइच्छावणा समयुत्तरा, णिक्खेवो तत्तिगो चेव उदयावलियवाहिरादो आवलियतिभागंतिमद्विदित्ति । ९. तेण परं* णिक्खेवो वड्डइ, अइच्छावणा आवलिया चेव । हीन प्रदेशाग्र दिया जाता है । इस प्रकार आवलीका त्रिभाग पूर्ण होने तक उत्तरोत्तर समयोमे विशेष हीन प्रदेशाग्र दिया जाता है । इससे उत्तर-समयवर्ती जो द्वितीय स्थिति है, उसका भी निक्षेप उतना ही है, अर्थात् उसके भी प्रदेशाग्र अपकर्पित होकर आवलीके त्रिभागवर्ती समयोमे उपर्युक्त क्रमसे दिये जाते हैं, अतः उसके निक्षेपका प्रमाण आवलीका त्रिभाग है । किन्तु अतिस्थापना एक समयसे अधिक आवलीके दो त्रिभाग-प्रमाण हो जाती है। इस प्रकार उत्तरोत्तर समयवाली स्थितियोकी अतिस्थापना एक-एक समय अधिक होती जाती है और निक्षेप उतना ही रहता है । यह क्रम उदयावलीके वाहिरसे लेकर आवलीके त्रिभागके अन्तिम समयवाली स्थितिके अपकर्षण होनेके क्षण तक प्रारम्भ रहता है । इस प्रकार आवलीके त्रिभागके जितने समय होते है, तत्प्रमाण समयवाली स्थितियोके प्रदेशाग्रोका अपकर्षण हो जानेपर उस अन्तिम स्थितिकी अतिस्थापनाका प्रमाण सम्पूर्ण आवली है । किन्तु निक्षेप जघन्य ही रहता है, अर्थात् उसका प्रमाण आवलीका त्रिभाग ही है । उस जघन्य निक्षेपसे परे समयोत्तर वृद्धिके क्रमसे उत्कृष्ट निक्षेप प्राप्त होने तक निक्षेपका प्रमाण बढ़ता जाता है किन्तु अतिस्थापना आवली-प्रमाण ही रहती है ॥५-९॥ विशेषार्थ-कर्मोंकी स्थितिके घटानेको स्थिति-अपवर्तना कहते है। यह कर्मोंकी स्थिति कैसे घटाई जाती है, ऊपरसे अपकर्षित कर कहाँ निक्षिप्त की जाती है, कहाँ नहीं, और किस क्रमसे निक्षिप्त की जाती है, इत्यादि प्रश्नोका उत्तर ऊपरकी शंकाका समाधान करते हुए चूर्णिकारने दिया है। ऊपरकी स्थितिके कर्म-प्रदेशोका अपकर्पण कर नीचे जिस स्थलपर उन्हे निक्षिप्त किया जाता है, उसे निक्षेप कहते हैं और जिस स्थल को छोड़ दिया जाता है अर्थात् जहॉपर ऊपरकी स्थितिके प्रदेशोको निक्षिप्त नहीं किया जाता, उसे अतिस्थापना कहते हैं । निक्षेप और अतिस्थापना ये दोनो जवन्य भी होते है और उत्कृष्ट भी होते है । दोनोके मध्यवर्ती भेद असंख्यात होते है। प्रकृतमे दोनोका स्पष्टीकरण जघन्य निक्षेप और जघन्य १ तदो पुवणिरुद्धळिदीदो अणंतरा जा ट्ठिदी उदयावलियबाहिरविदियट्टिदि त्ति उत्त होइ, तिस्से वि तत्तिओ चेव णिक्खेवो होइ, तत्य णाणत्ताभावादो। अइच्छावणा पुण समयुत्तरा होइ, उदयावलिय. वाहिरट्ठिदीए वि एदिस्से अइच्छावणाभावेण पदेसदसणादो । जयध० २ एत्थावलियतिभागग्गहणेण समयूणावलियतिभागो समयुत्तरो घेत्तव्यो। तदतिमग्गहणेण च तदणतरुवरिमछिदिविसेसो गहेयन्वो। तम्हा उदयावलियबाहिरादो जहणणिक्खेवमेत्तीओ द्विदीओ उल्ल. घिय ट्टिदाए टिठदीए संपुण्णावलियमेत्ती अइच्छावणा होइ त्ति सुत्तत्स भावत्यो । जयध० ६ ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'पदणिक्खेवो' पाठ मुद्रित है। (देखो पृ० १०४२) पर प्रकरणके अनुसार वह अशुद्ध है। आगे भी इस प्रकारका प्रयोग (सूत्र न० ३७ में) आया है, वहाँ यह 'तेण पर' पाठ मुद्रित है। (देखो पृ० १०४८)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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