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________________ गा० ४५ ] स्थितिसंक्रम-अर्थपद-निरूपण ३. ओडित्ता कथं णिक्खिवदि ठिदिं १ ४ उदयावलिय - चरिमसमय-अपविट्ठा जा हिदी सा कधमोकड्डिज्जह १५. तिस्से उदयादि जाव आवलियतिभागो ara णिक्खेवो, आवलियाए वे विभागा अइच्छायणा । ६. उदर बहुअ पदेसग्गं दिज्जर, तेण परं विसेसहीणं जाव आवलियतिभागोति । ७. तदो जा विदिया जातीय अन्य प्रकृति की स्थिति मे परिवर्तित करनेको प्रकृत्यन्तर- परिणमन कहते है । ज्ञानावरणादि मूलकर्मोंके स्थिति-संक्रमणको मूलप्रकृति- स्थितिसंक्रम कहते है और उत्तरप्रकृतियो के स्थिति - संक्रमणको उत्तरप्रकृति-स्थितिसंक्रम कहते है । इन दोनो प्रकारके स्थितिसंक्रमो मे यह भेद है कि उत्तरप्रकृतियोकी स्थितिका संक्रमण तो अपवर्तनादि तीनो प्रकारसे होता है । किन्तु मूल प्रकृतियोकी स्थितिका संक्रमण केवल अपवर्तना और उद्वर्तनासे ही होता है । इसका अर्थ यह हुआ कि ज्ञानावरणकर्मकी स्थिति दर्शनावरणकर्मरूपसे परिणत नही हो सकती है । केवल उनकी स्थिति घट और बढ़ सकती है । मूल कर्मों के समान मोहनीयके दर्शन मोहनीय और चारित्रमोहनीय इन दोनो भेदोकी स्थितिका भी परस्परमे आयुकर्मकी चारो उत्तरप्रकृतियो की भी स्थितियो का परस्परमे संक्रमण नही होता है । जिस स्थितिमे अपवर्तनादि तीनो ही न हो, उसे स्थिति - असंक्रम कहते है । उद्वर्तनाको उत्कर्षण और अपवर्तनाको अपकर्पण भी कहते है । संक्रमण नहीं होता, तथा ३११ शंका-विवक्षित स्थितियोका अपकर्षण करके अधस्तन स्थितियोमे उसे कैसे निक्षिप्त किया जाता है ? तथा उदयावलीके चरमसमय - अप्रविष्ट जो स्थिति है, अर्थात् वह स्थिति जो उदयावलीमे प्रविष्ट नही है और उदद्यावलीके बाहिर उपरितन प्रथम समय मे स्थित है, कैसे अपकर्षित की जाती है ? अर्थात् उस स्थितिका अपवर्तनारूप संक्रमण किस प्रकार से होता है ? ॥ ३-४ ॥ समाधान- उदयावली के बाहिर स्थित प्रथमस्थितिको अपकर्षित करके उदयावली के प्रथम समयवर्ती उदयसे लेकर आवलीके त्रिभाग तक निक्षिप्त करता है, आवलीके उपरिम दो त्रिभागो मे निक्षिप्त नही करता । अतएव उद्यावलीका प्रथम त्रिभाग उस उदद्यावलीबाह्य स्थित प्रथम स्थितिके निक्षेपका विषय है और आवलीके शेष दो त्रिभाग अतिस्थापनारूप है । अर्थात् उदयावली के उपरितन प्रथम समयवाली स्थिति के प्रदेशो का अपकर्पण कर उन्हे उदयावलीके अन्तिम दो त्रिभागोको छोड़कर प्रथम त्रिभागमे स्थापित किया जाता है । प्रथम त्रिभागमे भी उदयरूप प्रथम समयमे बहुत प्रदेशाय दिया जाता है, उससे परवर्ती द्वितीय समयमै विशेष हीन प्रदेशाय दिया जाता है, उससे परवर्ती तृतीय समय में और भी विशेष ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'ठिदि' पदको टीकामे सम्मिलित कर दिया है, जब कि टीकाके प्रारम्भमे 'टिट्ठदिं' पद दिया हुआ है । ( देखो पृ० १०४१ ) १ त जहा - तमोकड्डिय उदयादि जाव आवलियतिभागो ताव णिक्खिवदि, आवलिय-वे-तिभागमत्तमुवरिमभागे अइच्छावे । तदो आवलियतिभागो तिस्से णिक्खेवविसओ, आवलिय-वे-तिभागा च अइच्छावणा त्ति भण्णइ । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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