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________________ ठिदि-संकमाहियारो १. ठिदिसंकमो दुविहो- मूलपयडिट्ठिदिसंकमो च, उत्तरपयडिडिदिसंकमो च । २. तत्थ अट्ठपदं - जा ट्ठिदी ओकड्डिज्जदि वा उक्कड्डिज्जदि वा अण्णपयडिं संकामिज्जहवा, सो द्विदि-संकमो । सेसो द्विदि-असंकमो । स्थिति-संक्रमाधिकार अब यतिवृषभाचार्य क्रम प्राप्त स्थितिसंक्रमणका वर्णन करनेके लिए सूत्र कहते हैंचूर्णिसु० - स्थितिसंक्रम दो प्रकारका है - मूलप्रकृतिस्थितिसंक्रम और उत्तरप्रकृतिस्थितिसंक्रम | इन दोनो स्थितिसंक्रमो के स्पष्टीकरण के लिए यह अर्थपद है - जो स्थिति अपवर्तित की जाती है, या उद्वर्तित की जाती है, या अन्य प्रकृति में संक्रान्त की जाती है, उस स्थिति - को स्थितिसंक्रम कहते है । शेप स्थितिको स्थिति - असंक्रम कहते हैं ॥१-२॥ विशेषार्थ - किसी प्रकार के विशेष परिवर्तन या संक्रान्तिको संक्रम या संक्रमण कहते है । यह संक्रमण या परिवर्तन यदि कर्मों की प्रकृतियो में हो, तो उसे प्रकृतिसंक्रम कहते है । यदि कर्मोकी स्थितिमे परिवर्तन हो, तो उसे स्थितिसंक्रम कहते हैं । इसी प्रकार अनुभागके परिवर्तनको अनुभागसंक्रम और कर्म- प्रदेशो के परिवर्तनको प्रदेशसंक्रम जानना चाहिए । प्रकृतमे स्थितिसंक्रम विवक्षित है । कर्मों की स्थितिका संक्रमण अपवर्तनासे होता है, उद्वर्तनासे होता है और पर - प्रकृतिरूप परिणमनसे भी होता है । कर्म - परमाणुओकी दीर्घकालिक स्थिति - को घटाकर अल्पकालिकरूपसे परिणत करनेको अपवर्तना कहते हैं । कर्मों की अल्पकालिक स्थिति बढ़ानेको उद्वर्तना कहते है । संक्रमके योग्य किसी विवक्षित प्रकृतिक स्थितिको समान १ ठिइसकमो ति बुच्च मूलुत्तरपगइतो उ जा हि टिई | उचट्टिया व ओट्टिया व पगई णिया वऽण्णं ॥ २८ ॥ चूर्णि :- जा ट्ठिती उब्वट्टण ओवट्टण- अण्णपगतिस कमणपाओग्गा सा उव्वहिता ठिति कमो वुञ्चति, ओवट्टता विठितिसंकमो वुञ्चद्द, अण्णपगतिं सकमिया वि ठितिसकमो युच्चति । ( कम्मप० सक्र० ) तस्थ मूलपयडीए मोहणीयसष्णिदाए जा ट्रिट्ठदी, तिस्से सकमो मूलपयडिट्ठिदिसंकमो उच्चइ । एवमुत्तरपयडिट्ठिदिसकमो च वत्तत्वो । जयध० 1 २ एत्थ मूलपयडिट्ठिदीए ओकड्डुकडणवसेण संकमो । उत्तरपयडिट्रिटदीए पुण ओकड्डुकड्डुणपरपयडिसंकतीहि संकमो दटुव्वो । एदेणोकड्डुणादओ जिससे हिंदीए णत्थि सा हिंदी हिदिअसकमो ति भण्णदे | जयघ ताम्रपत्रवाली प्रतिमे 'तत्थ अट्पद' इतना अगको टीकामें सम्मिलित कर दिया है, जब कि 'सेसो तक ही अर्थपद बतलाया गया है । ( देखो पृ० १०४१ ) 'सूत्र मुद्रित है, ट्ठदि असकमो', आगे के 'जा दिदी' आदि क्योंकि वहाँ तक वह सूत्र
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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