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________________ ३०९ गा० ५८] संक्रमस्थान-अल्पवहुत्व-निरूपण साहिया' । २५७. वारसहं संकामया विसेसाहिया । २५८. तिण्हं संकामया संखेज्जगुणा । २५९. तेरसण्हं संकामया संखेज्जगुणा । २६०. वावीससंकामया संखेज्जगुणा । २६१. छब्बीसाए संकामया असंखेज्जगुणां । २६२. एकवीसाए संकामया असंखेज्जगुणा । २६३. तेवीसाए संकामया असंखेज्जगुणां । २६४. सत्तावीसाए संकामया असंखेज्जगुणा' । २६५. पणुवीससंकामया अणंतगुणा । तदो पयडिट्ठाणसंकमो समत्तो । एवं पयडिसंकमो समत्तो ॥ मकोसे दश प्रकृतियोके संक्रामक विशेप अधिक है । दश प्रकृतियोके संक्रामकोसे ग्यारह प्रकृतियोके संक्रामक विशेष अधिक है। ग्यारह प्रकृतियोके संक्रामकोसे वारह प्रकृतियोके संक्रामक विशेष अधिक हैं। वारह प्रकृतियोके संक्रामकोसे तीन प्रकृतियोके संक्रामक संख्यातगुणित हैं। तीन प्रकृतियोके संक्रामकोसे तेरह प्रकृतियोके संक्रामक संख्यातगुणित हैं। तेरह प्रकृतियोके संक्रामकोसे बाईस प्रकृतिथोके संक्रामक संख्यातगुणित हैं। वाईस प्रकृतियोके संक्रामकोसे छब्बीस प्रकृतियोके संकामक असंख्यातगुणित है । छब्बीस प्रकृतियोके संक्रामकोसे इक्कीस प्रकृतियोके संक्रामक असंख्यातगुणित है । इक्कीस प्रकृतियोके संक्रामकोसे तेईस प्रकृतियोके संक्रामक असंख्यातगुणित है । तेईस प्रकृतियोके संक्रामकोसे सत्ताईस प्रकृतियोके संक्रामक असंख्यातगुणित है । सत्ताईस प्रकृतियोके संक्रामकोसे पच्चीस प्रकृतियोके संक्रामक अनन्तगुणित है ॥२५३-२६५॥ भुजाकार आदि शेष अनुयोगद्वारोका वर्णन सुगम होनेसे चूर्णिकारने नहीं किया है। इस प्रकार प्रकृतिस्थानसंक्रमकी समाप्तिके साथ प्रकृतिसंक्रम समाप्त हुआ। १. छण्णोकसायक्खवणद्धासादिरेयइस्थिवेदक्खवणद्धासचयस्स सगहादो । जयध० २. तत्तो विसेसाहियणवुसयवेदक्खवणद्धाए सकलिदसरूवत्तादो । जयध० ३. अस्सकण्ण करण-किटीकरण-कोहकिट्टीवेदगकालपडिबद्धाए तिण्ह सकामणद्धाए णवुसयवेदक्खवणकालादो किंचूणतिगुणमेत्ताए सकलिदसरूवत्तादो । जयध ४. अट्ठकसाएसु खविदेसु जावाणुपुब्बीसंकमो णाढविनइ, ताव पुल्लिकालादो सखेजगुणकालम्मि सचिदत्तादो । जयध० ५. दसणमोहक्खवगो मिच्छत्त खविय जाव सम्मामिच्छत्त ण खवेइ, ताव पुविल्लद्धादो सखेजगुणभूदम्मि कालेण एदेसिं, सचिदसरूवाणमुवलभादो । जयध ६. कुदो, सम्मत्तमुव्वेल्लिय सम्मामिच्छत्तमुवेल्लमाणस्स कालो पलिदोवमासखेजभागमेतो, तत्थ सचिदजीवरासिस्स पलिदोवमस्स असखेजदिभागमेत्तस्स पढमसम्मत्तग्गहणपढमसमयवद्रमाणजीवेहि सह गहणादो । जयघ० ७. कुदो, वेसागरोवमकालसचिदखइयसम्माइट्ठिरासिस्स पहाणभावेण इहम्गहणादो। जयध० ८. छावसिागरोवमकालव्भतरसचिदत्तादो । जइ एव, सखेजगुणत्त पसजदे, कालगुणयारस्स तहाभावोवलभादो त्ति ? ण एस दोसो, उवकमाणजीवपाहम्मेण असखेजगुणत्तसिद्धीदो। त जहा-खइयसम्माइट्टीणमयसमयसचओ सखेजजीवमेत्तो । चउवीससतकम्मियाण पुण उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असखेजदिभागमेत्ता एयसमए उवक्कमता ल्भति, तम्हा एहिंतो एदेसिमसखेजगुणत्तमविरुद्धमिदि । जयध० ९. कुदो, अठ्ठावीससतकम्मियसम्माइट्ठिम्मि मिच्छाइट्ठीणमिहरगहणादो । जयध० १०. किंचूगसधजीवरासिस्स पणुवीससकामयत्तेण विवक्खियत्तादो ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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