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________________ ३०८ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार संकामया संखेज्जगुणा' । २४७. अट्ठण्हं संकामया विसेसाहिया । २४८. अट्ठारसण्हं संकायया विसेसाहियाँ । २४९. एगूणवीसाए संकामया विसेसाहियाँ । २५०. चउण्हं संकामया संखेज्जगुणा । २५१. सत्तण्हं संकामया विसेसाहियाँ । २५२. वीसाए संकामया विसेसाहियाँ । २५३. एकिस्से संकामया संखेज्जगुणा । २५४. दोहं संकामया विसेसा. हिया । २५५. दसण्हं संकायया विसेसाहिया । २५६. एकारसण्हं संकामया विसेप्रकृतियोंके संक्रामकोके वरावर हैं । छह प्रकृतियोके संक्रामकोसे चौदह प्रकृतियोके संक्रामक संख्यातगुणित हैं । चौदह प्रकृतियोके संक्रामकोसे पाँच प्रकृतियोके संक्रामक संख्यातगुणित हैं । पॉच प्रकृतियोके संक्रामकोसे आठ प्रकृतियोके संक्रामक विशेप अधिक है। आठ प्रकृतियांके संक्रामकोसे अट्ठारह प्रकृतियोके संक्रामक विशेप अधिक है। अट्ठारह प्रकृतियोके संक्रामकोसे उन्नीस प्रकृतियोके संक्रामक विशेष अधिक है। उन्नीस प्रकृतियोके संक्रामकोसे चार प्रकृतियोंके संक्रामक संख्यातगुणित है। चार प्रकृतियोके संक्रामकोसे सात प्रकृतियोके संक्रामक विशेष अधिक है। सात प्रकृतियोके संक्रामकोसे वीस प्रकृतियोके संक्रामक विशेष अधिक है ॥२४२-२५२॥ चूर्णिसू०-वीस प्रकृतियोंके संक्रामकोसे एक प्रकृतिके संक्रामक संख्यातगुणित हैं। एक प्रकृतिके संक्रामकोंसे दो प्रकृतियोंके संक्रामक विशेष अधिक हैं। दो प्रकृतियोके संक्रा १, कुदो; इगिवीस-चउवीससतकम्मिओवसामयाणमतोमुहुत्तसमऊणदोआबलियसचिदाणमिहोवलभादो । जयध २. किं कारण ? इगिवीसस तकश्मियोवतामयस्स दुविहमायोवसामणकालादो दुविहमाणोवसामणडाए विसेसाहियत्तदसणादो, चउवीससतकम्मिभोवसामगसमऊणदोआवलियसचयस्स उयत्य समाणत्तदसणादो च । जयध० ३, एत्थ वि कारण माणोक्सामणद्धादो विसेसाहियकोहोवसामणद्धादो वि छण्णोकसाओवसामणकालत्स विसेसाहियत्तं दद्र्व्व | जयध० ४. एत्थ वि कारणमिस्थिवेदोवसामणाकालस्स छण्णोकसायोवसामणद्धादो विसेसाहियत्तमणुगतव्य | जयध० ५. कुदो, सगतोभाविदचदुसंकामयखवयदुविहलोहसकामयच उवाससतकम्मिओवसामयरासिस्स पहाणत्तावलंबणादो। तदो जइ वि पुबिल्लसचयकालाटो एस्थतणसचयकालो विसेसहीणो, तो वि चउवीस. संतकम्मियरासिमाहप्पाटो सखेजगुणो त्ति सिद्ध । जयध० .. ६. चउवीससंतकम्मिओवसामयदुविहलोहोवसामणकालादो विसेसाहियदुविहमायोवसामणकाल. सचिदत्ताटो| जयघ० ७ जइ वि ढोण्हमेदेसि चउवीससतकम्मिया सकामया, तो वि सत्तसकामयकालाटो वि वीससका मयकालरस छण्णोकसायोवसामणद्वापहिबद्धस्सविसाहियत्तमनिसऊण तत्तो एदेसि विसेसाहियत्त मविरुद्धं | जयघ० ८. कुदो; मायासंकामयखवयरासिस्स अतोमुहुत्त कालसचिदत्स विवक्खियत्तादो। जयध ९. एकित्से सकमणकालादो दोण्ह सकमकालत्स विसेमाहियत्तोवलद्धीदो । जयध० १०. माणसंजलणखवणद्वादो विसेसाहियछण्णोक्सायखवणदाए लद्धसचयत्तादो । जनध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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