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________________ ३०७ संक्रमस्थान-अल्पबहुत्व-निरूपण गा०५८] २३५. जहण्णेण एयसमओ । २३६. उकस्सेण छम्मासा' । २३७. सेसाणं णवण्हं संकमट्ठाणाणमंतरं केवचिरं कालादो होइ ? २३८. जहण्णेण एयसमओ। २३९. उक्कस्सेण संखेज्जाणि वस्साणि । २४०. जेसिमविरहिदकालो तेसिं णत्थि अंतरं । २४१. सण्णियासो णस्थि । २४२. अप्पाबहुअं । २४३. सव्वत्थोवा णवण्हं संकामया । २४४. छण्हं संकामया तेत्तिया चे । २४५. चोदसण्हं संकामया संखेज्जगुणा । २४६. पंचण्हं नौ संक्रमस्थानोका अन्तरकाल कितना है ? ॥२३४॥ समाधान-उक्त नवों स्थानोके संक्रामकोका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल छह मास है ॥२३५-२३६॥ शंका-शेप नौ संक्रमस्थानोका अन्तरकाल कितना है ? ॥२३७॥ समाधान-शेष बीस, उन्नीस, अट्ठारह, सत्तरह, नौ, आठ, सात, छह और पांचप्रकृतिक नौ संक्रमस्थानोका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल संख्यात वर्ष है ॥२३८-२३९॥ ___ चूर्णिसू०-जिन सत्ताईस, छब्बीस, पञ्चीस, तेईस और इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थानोके कालका कभी विरह नहीं होता, उनका अन्तर नहीं है ।।२४०॥ चूर्णिमू०-संक्रमस्थानोका सन्निकर्प नहीं होता । क्योकि, एक संक्रमस्थानके निरुद्ध करनेपर उसमे शेप संक्रमस्थान संभव नहीं है ॥२४१॥ चूर्णिसू ०-अब संक्रमस्थानोका अल्पबहुत्व कहते है । नौ प्रकृतियोके संक्रामक वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है । छह प्रकृतियोके संक्रामक भी उतने ही है, अर्थात् नौ १. वावीसाए ताव जहण्णेणेयसमओ, उक्कस्सेण छम्मासमेत्तमतर होइ, दसणमोह-क्खवणपट्ठवणाए णाणाजीवावेक्खजहण्णुकस्सतराण तेत्तियमेत्तपरिणामाणमुवलभादो | एव तेरसादीण पि वत्तव्व, खवयसेढीलद्धसरूवाणमेदेसि णाणाजीवावेक्खाए जहण्णुक्कसतराण तप्पमाणाणमुवलद्धीदो । जयध० २. एत्थ सेसग्गहणेण २०, १९, १८, १४, ९, ८,७, ६, ५ एदेसि सकमट्ठाणाण सगहो कायवो । ३. एदेसि च उवसमसेढिसबधीण जहण्णेण एयसमओ। उक्कस्सेण वासपुधत्तमेत्तमतर होइ, तदारोहणविरहकालस्स तेत्तियमेत्तस्स णिवाहमुवलद्धीदो। सुत्ते सखेजवस्सग्गहणेण वासपुधत्तमेत्तकालविसेसपडिवत्ती । कुदो ? अविरुद्धाइरियवक्खाणादो । जयध० ४ त कथ ! इगिवीससतकम्मिओ उवसमसेढिं चढिय दुविह कोह कोहसजलणचिराणसतेण सह उवसामयतण्णवकबधमुवसामेतो समऊणदोआवलियमेत्तकाल णवण्ह सकामओ होइ, तदो थोवयरकालसचिदत्तादो थोवयरत्तमेदेसिं सिद्ध । जयध० ५. कुदो, माणसजलणणवकवधोवसामणापरिणदाणमिगिवीससतकम्मिओवसामयाण समऊण-दोआवलियमेत्तकालसचिदाणमिहावलबणादो। एदेसि च दोण्ह रासीण सरिसत्तं चढमाणरासिं पहाण कादूण भणिद, ओयरमाणरासिस्स विवस्खाभावादो। तम्हि विवक्खिये छसकामएहितो णवसकामयाणमद्धाविसेसेण विसेसाहियत्तदसणादो । जयध० ६. जइ वि एदे वि समऊणढोआवलियमेत्तकालसचिदा, तो वि सखेजगुणत्तमेदेसि ण विरुज्झदे; इगिवीससतकम्मिओवसामएहिंतो चउबीससतकम्मिओवसामयाण सखेजगुणत्तदसणादो । जयध०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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