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________________ ३०६ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार २२५. णाणाजीवेहि भंगविचओ । २२६. जेसि पयडीओ अत्थि तेसु पयदं । २२७. सव्यजीवा सत्तावीसाए छब्बीसाए पणुवीसाए तेवीसाए एकवीसाए एदेसु पंचसु संकमट्ठाणेसु णियमा संकामगा । २२८. सेसेसु अट्ठारससु संकमट्ठाणेसु भजियव्या। २२९. णाणाजीवेहि कालो । २३०. पंचण्हं हाणाणं संकामया सव्वद्धा । २३१. सेसाणं हाणाणं संकामया जहणणेण एगसमओ । उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । २३२. णवरि एकिस्से संकामया जहण्णुक्कस्सेणंतोमुहुत्तं । २३३. णाणाजीवेहि अंतरं । २३४. वावीसाए तेरसण्हं वारसह एकारसण्हं दसण्हं चदुण्हं तिण्हं दोण्हमेकिस्से एदेसि णवण्हं ठाणाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? को पूरा किया। इस प्रकार उन संक्रमस्थानोका दो अन्तमुहूर्त और आठ वर्षसे कम दो पूर्वकोटीसे अधिक तेतीस सागरोपम-प्रमाण उत्कृष्ट अन्तरकाल सिद्ध हो जाता है। यहाँ इतनी बात ध्यानमे रखना आवश्यक है कि बारह और तीन-प्रकृतिक संक्रमस्थानका अन्तर क्षपकश्रेणीकी अपेक्षा निरूपण करना चाहिए । चूर्णिसू ०-अब नानाजीवोकी अपेक्षा संक्रमस्थानोका भंगविचय कहते है। जिन जीवोके विवक्षित प्रकृतियोकी सत्ता पाई जाती है, उनमे ही यह भंगविचय प्रकृत है। सर्व जीव सत्ताईस, छब्बीस, पचीस, तेईस और इक्कीस, इन पॉच संक्रमस्थानोपर नियमसे संक्रामक होते है। शेप अट्ठारह संक्रमस्थानोपर वे भजितव्य है, अर्थात् संक्रामक होते भी है, और नहीं भी होते है ॥२२५-२२८।। ___ चूर्णिसू०-अब नाना जीवोकी अपेक्षा संक्रमस्थानोका काल कहते है-सत्ताईस, छब्वीस, पञ्चीस, तेईस और इक्कीस-प्रकृतिक पांच संक्रमस्थानोके संक्रामक जीव सर्व काल होते है। शेप अट्ठारह स्थानोके संक्रामकोका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है । विशेषता केवल यह है कि एक प्रकृतिके संक्रामकोका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥२२९-२३२।। चूर्णिमू०-अब नाना जीवोकी अपेक्षा संक्रमस्थानोका अन्तर कहते हैं ॥२३३॥ शंका-वाईस, तेरह, बारह, ग्यारह, दश, चार, तीन, दो और एक-प्रकृतिक १. एदेसि पचण्ह संकमट ठाणाणं सकामया जीवा सव्वकालमस्थि त्ति भणिद होइ । जयध० २. एत्थ सेसग्गहणेण वावीसादीण सकमठाणाण गहण कायव । तेसिं च जहण्णकालो एयसमयमेत्तो; उवसमसेढिम्मि विवक्खियसकमाणसंकामयत्तेणेयसमय परिणदाण केत्तियाण पि जीवाण विदियसमए मरणपरिणामेण तदुवलंभादो । उक्करसकालो अतोमुहुत्त; तेसि चेव विवक्खियसकमट्ठाणसकामयोवः सामयाणमुवरि चढताणमण्णेहि चढणोवयरणवावदेहिं अणुसधिटसंताणाणमविच्छेदकालस्स समालवणादा। णवरि तेरस-बारस-एकारस-चदु-तिण्णि-दोणिस कामगाण खवगोवसामगे अस्सिऊण उक्कस्सकालपरूवणा कायबा1 जयध० ३. एत्थ एकिस्से सकामयाणं जह्मणकालो कोहमाणाणमण्गदरोदएण चढिदाण मायासंकामयाणमणणुसंधिदसताणाणमतोमुहुत्तमेत्तो होइ । उक्करसकालो पुण मायासंकामयाणमणुसधिदपवाहाण होइ त्ति वत्तव्य। जयघ०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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