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________________ गा० ५८] संक्रमस्थान-अन्तर-निरूपण ३०५ २२२. सेसाणं संकामयाणमंतरं केवचिरं कालादो होइ ? २२३. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । २२४. उकस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । शंका-शेष अर्थात् उन्नीस, अट्ठारह, वारह, नौ, छह और तीन-प्रकृतिक संक्रमस्थानोका अन्तरकाल कितना है ? ॥२२२।। समाधान-उक्त संक्रमस्थानोका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल सातिरेक तेतीस सागरोपम है ॥२२३-२२४॥ विशेषार्थ-सूत्रमे शेष पदके द्वारा सूचित संक्रमस्थानोके जवन्य और उत्कृष्ट अन्तरकालोंका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाला कोई उपशामक उपशमश्रेणीमे अन्तरकरणकी समाप्ति के अनन्तर ही आनुपूर्वीसंक्रमणको आरम्भ करके नपुंसकवेदका उपशम कर इक्कीसका संक्रामक हुआ। पुनः स्त्रीवेदका उपशमन करके अन्तरका प्रारम्भ कर अट्ठारहका संक्रामक हुआ और छह नोकपायोका उपशमन करके अन्तर उत्पन्न कर उसी समय बारहका संक्रमण आरम्भ किया, पुनः पुरुपवेदका उपशम कर और अन्तरको प्राप्त होकर तत्पश्चात् दोनो प्रकारके क्रोधका उपशम किया और नौके संक्रमस्थानको प्राप्त होकर संज्वलनक्रोधका उपशम करके नौके अन्तरका आरम्भ किया । पुनः दोनो प्रकारके मानका उपशम करके छहका संक्रामक हुआ और संज्वलनमानका उपशम करके छहके अन्तरका आरम्भ किया । तदनन्तर दोनों मायाका उपशम करके तीनका संक्रामक हुआ और संज्वलन मायाका उपशम करके तीनके अन्तरका आरम्भ कर ऊपर चढ़ा और वापिस उतरते हुए तीनो मायाकपायोकी उद्वर्तना करके छहका संक्रामक बनकर, तीनो मानकषायोकी उद्वर्तना करके नौका संक्रामक वनकर, तीनो क्रोधोकी उद्वर्तना करके बारहका संक्रामक बनकर और सात नोकपायोकी उदतना करके उन्नीसका संक्रामक बनकर यथाक्रमसे उन उन संक्रमस्थानोके अन्तरको पूरा किया । इस प्रकार उन्नीस, अट्ठारह, वारह, छह और तीन प्रकृतिक संक्रमस्थानोमेसे प्रत्येकका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जघन्य अन्तर सिद्व हो जाता है । इन्ही स्थानोके उत्कृष्ट अन्तरका विवरण इस प्रकार है-चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाला कोई एक वेदकसम्यग्दृष्टि देव या नारकी पूर्वकोटीकी आयुवाले मनुष्योमे उत्पन्न हुआ और गर्भसे लगाकर आठ वर्षके पश्चात् सर्वलघुकालसे विशुद्ध होकर संयमको प्राप्त होकर और दर्शनमोहनीयका क्षय करके उपशमश्रेणीपर चढ़ा । चढ़ते समय तीन और अट्ठारहके अन्तरको उत्पन्न करके तथा उतरते हुए छह, नौ, वारह और उन्नीसके अन्तरको उत्पन्न करके देशोन पूर्वकोटी तक संयमका परिपालन कर जीवनके अन्तमे मरा और तेतीस सागरोपमकी आयुवाले देवोमें उत्पन्न हो गया । पुनः आयुके अन्तमें वहाँसे च्युत होकर पूर्वकोटीकी आयुवाले मनुष्योमे उत्पन्न हुआ और जीवन के अन्तमुहूर्त शेप रह जानेपर उपशमश्रेणीपर चढ़ करके यथाक्रमसे पूर्वोक्त सर्व संक्रमस्थानोके अन्तर ताम्रपत्रवाली प्रतिमे 'सादिरेयाणि' के स्थानपर 'देसूणाणि' पाठ मुद्रित है, ( देखो पृ० १०२६) जो कि टीकामें किये गये व्याख्यानके अनुसार नहीं होना चाहिए । ३९
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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