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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार २१५. पणुवीस कामयंतरं केवचिरं कालादो होइ १ २१६. जहणेण अंतोमुहुत्तं । २१७. उक्कस्सेण वे छावट्ठि सागरोवमाणि सादिरेयाणि । २१८. वावीस-वीसचोदस-तेरस एकारस-दस अट्ठ-सत्त- पंच-च- दोणिसंकामयंतरं केवचिरं कालादो होइ ? २१९. जहणेण अंतोमुहुत्तं । २२०. उकस्सेण उवडपोग्गल परियङ्कं । २२१. एकिस्से संकायस्स णत्थि अंतरं । ३०४ शंका - पच्चीस - प्रकृतिक संक्रमस्थानका अन्तरकाल कितना है ? || २१५ ॥ समाधान- पच्चीस - प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल सातिरेक दो वार छयासठ सागरोपम है ।।२१६-२१७॥ विशेपार्थ- पच्चीस - प्रकृतिक संक्रमस्थानके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकालका स्पष्टी - करण इस प्रकार है- कोई एक सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव पच्चीस प्रकृतियों का संक्रमण करता हुआ अवस्थित था । वह परिणामो के वशसे सम्यक्त्व या मिध्यात्वको प्राप्त हुआ । वहॉपर सर्व जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक रहकर और सत्ताईसका संक्रमण कर अन्तरको प्राप्त होकर पुन: सम्यग्मिथ्यात्वको प्राप्त होकर पच्चीसका संक्रामक हो गया । इस प्रकार अन्तर्मुहूर्तप्रमाण पच्चीस-प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्य अन्तर सिद्ध हो जाता है । इसीके उत्कृष्ट अन्तर कालका विवरण इस प्रकार है - पच्चीसका संक्रामक कोई एक मिथ्यादृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और किसी भी अविवक्षित संक्रमस्थानके साथ अन्तरको प्राप्त होकर पुनः मिथ्यात्व में जाकर सर्वोत्कृष्ट उद्वेलनकालसे सम्यक्त्व प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करता हुआ उपशमसम्यक्त्व के अभिमुख होकर अन्तरकरणको करके मिथ्यात्वकी प्रथमस्थितिके चरम समयमे सम्यग्मिथ्यात्वकी चरम फालीका संक्रमण करके तदनन्तर समय मे सम्यक्त्वको प्राप्त होकर छयासठ सागर तक परिभ्रमण करके उसके अन्तमे मिध्यात्वको प्राप्त होकर पल्योपमके असंख्यातवें भागमात्र काल तक सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करके यथासम्भव प्रकार से सम्यक्त्वको ग्रहण करके दूसरी वार छयासठ सागरोपम तक सम्यक्त्वके साथ रहकर अन्तमें फिर भी मिध्यात्वमें जाकर दीर्घ उद्वेलनकालसे सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करके पच्चीसका संक्रामक हुआ । इस प्रकार तीन पल्योपमके असंख्यात भागोसे अधिक एक सौ वत्तीस सागरोपमप्रमाण पच्चीस - प्रकृतिक संक्रमस्थानका उत्कृष्ट अन्तरकाल जानना चाहिए । शंका-बाईस, वीस, चौदह, तेरह, ग्यारह, दश, आठ, सात, पाँच, चार और दो प्रकृतिक संक्रमस्थानका अन्तरकाल कितना है ? ॥२१८॥ समाधान - उक्त संक्रमस्थानोका जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्धपुगलपरिवर्तन है ॥२१९-२२० ॥ चूर्णि सू० (० - एक प्रकृतिके संक्रामकका अन्तर नहीं होता है || २२१ ॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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