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________________ ३०२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार २१३. जहण्णेण एयसमओ । २१४. उकस्सेण उवड्दपोग्गलपरिय{ । समाधान-उक्त संक्रमस्थानोका जघन्य अन्तरकाल एक समय और उत्कृष्ट अन्तरकाल उपार्धपुद्गलपरिवर्तन है ।।२१३-२१४॥ विशेपार्थ-सूत्रोक्त संक्रमस्थानोके अन्तरकालोंमेंसे यथाक्रससे पहले सत्ताईस-प्रकृतिक संक्रमस्थानके जघन्य अन्तरका स्पष्टीकरण करते हैं-सत्ताईसका संक्रामक कोई उपशमसम्यदृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वके कालमें एक समय रहनेपर सासादनगुणस्थानको प्राप्त हुआ और एक समय पच्चीसका संक्रामक रहकर अन्तरको प्राप्त हो दूसरे ही समयमें मिथ्यादृष्टि बनकर सत्ताईसका संक्रामक हो गया। इस प्रकार एक समयमात्र प्रकृत संक्रमस्थानका जघन्य अन्तरकाल सिद्ध हो जाता है । अथवा सत्ताईसका संक्रामक कोई मिथ्यादृष्टि जीव सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करता हुआ सम्यक्त्वके अभिमुख होकर अन्तर करके और मिथ्यात्वकी प्रथमस्थितिके द्विचरम समयमे सत्ताईसके संक्रामकरूपसे सम्यक्त्वप्रकृतिकी चरमफालीको मिथ्यात्वके ऊपर संक्रमित करके उसके अनन्तर चरम समयमें छब्बीसका संक्रमण करके अन्तरको प्राप्त हुआ और सम्यक्त्वको प्राप्त करनेके प्रथम समयमें पुनः सत्ताईसका संक्रामक हो गया। इस प्रकारसे भी सत्ताईस-प्रकृतिक संक्रमस्थानका एक समयप्रमाण जघन्य अन्तर सिद्ध हो जाता है । इसीके उत्कृष्ट अन्तर कालका विवरण इस प्रकार है-कोई एक अनादिमिथ्यादृष्टि जीव अर्धपुद्गलपरिवर्तनके आदि समयमे उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और सर्व लघुकालसे मिथ्यात्वमे जाकर सर्व जघन्य उद्वेलना-कालसे सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करके और सत्ताईस-प्रकृतिक संक्रमस्थानके अन्तरको प्राप्त हुआ। पुनः देशोन अर्धपुद्गलपरिवर्तन तक संसारमे परिभ्रमण करके सिद्ध होनेमे जब अन्तर्मुहूर्त काल शेप रहा, तब उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । उसके दूसरे समयमे सत्ताईसका संक्रमण करनेपर सत्ताईस-प्रकृतिक संक्रमस्थानका उपार्धपुगल-परिवर्तनप्रमाण उत्कृष्ट अन्तरकाल प्राप्त होता है। छब्बीस-प्रकृतिक संक्रमस्थानके एक समयमात्र जघन्य अन्तरकालका विवरण इस प्रकार है-जिसने सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना कर दी है ऐसा कोई छब्बीसका संक्रामक जीव उपशमसम्यक्त्वके अभिमुख होकर मिथ्यात्वकी प्रथम स्थितिके द्विचरम समयमे सम्यग्मिथ्यात्वकी चरम फालीको मिथ्यात्वरूपसे संक्रमित करके तदनन्तर समयमै ही पच्चीसके संक्रमण-द्वारा अन्तरको प्राप्त होकर उपशमसम्यक्त्वके प्रथम समयमे पुनः छब्बीसका संक्रामक हो गया । इस प्रकार जघन्य काल सिद्ध हो गया । इसीके उत्कृष्ट अन्तरकालका विवरण इस प्रकार है-कोई अनादिमिश्यावृष्टि जीव अर्धपुद्गलपरिवर्तनके आदि समयमे उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त होकर और सर्व लघुकालसे मिथ्यात्वमे जाकर सर्व जघन्य उद्वेलनाकालसे सम्यक्त्वप्रकृतिकी उद्वेलना करके छब्बीसका संक्रामक हो गया । पुनः सर्व लघुकालसे सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करके पञ्चीसके संक्रामक रूपसे अन्तरको प्राप्त हुआ और देशोन अर्धपुद्गलपरिवर्तन तक परिभ्रमण करके संसारके अन्तर्मुहूर्तमात्र शेप रह जानेपर उपशमसम्यक्त्वको
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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