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________________ गा० ५८] संक्रमस्थान अन्तर-निरूपण ३०१ समओ। २०५. उक्कस्सेण तेत्तीसं सागरोवमाणि सादिरेयाणि । २०६. चोदसण्हं णवण्हं छण्हं पि कालो जहण्णणेयसमओ। २०७. उक्कस्सेण दो आवलियाओ समयूणाओ । २०८. अधवा उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ओयरमाणस्स लभइ । २०९. एकिस्से संकामओ केवचिरं कालादो होइ ? २१०.जहण्णुक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । २११. एत्तो एयजीवेण अंतरं । २१२. सत्तावीस-छब्बीस-तेवीस-इगिवीससंकामगंतरं केवचिरं कालादो होइ ? समाधान-इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल साधिक तेतीस सागरोपम है ॥२०४-२०५॥ विशेषार्थ-इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थानके जघन्य कालका स्पष्टीकरण इस प्रकार हैचौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाला कोई एक जीव नपुंसकवेदका उपशमन करके इक्कीस प्रकृतियोका संक्रामक हुआ और दूसरे ही समयमे मरकर देव हो गया। इस प्रकार एक समयमात्र जघन्य काल सिद्ध हो जाता है। अथवा चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशमसम्यग्दृष्टि जीवके कालमे एक समय शेष रहनेपर सासादनगुणस्थानको प्राप्त होनेपर भी प्रकृत संक्रमस्थानका एक समयमात्र जघन्य काल पाया जाता है। उत्कृष्ट कालका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-देव या नरकगतिसे मनुष्यगतिमे आया हुआ चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाला कोई जीव गर्भसे लेकर अन्तर्मुहर्त से अधिक आठ वर्षका हो जानेपर सर्वलघुकालसे दर्शनमोहकी क्षपणासे परिणत होकर और इक्कीस प्रकृतियोका संक्रमण प्रारम्भ करके देशोन पूर्वकोटी तक संयमभावके साथ विहार करके जीवनके अन्तमे मरा और विजयादिक अनुत्तर विमानोमें एक समय कम तेतीस सागरोपमकी आयुका धारक देव हो गया । वह वहॉपर अपनी आयुको पूरा करके च्युत हुआ और पूर्वकोटी आयुका धारक मनुष्य हुआ । जव उसके सिद्ध होनेमे अन्तर्मुहूर्तमात्र काल शेष रह गया, तब क्षपकश्रेणीपर चढ़कर और आठ मध्यम कषायोका क्षय करके तेरह प्रकृतियोका संक्रामक हुआ । इस प्रकार दो अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्षसे कम दो पूर्वकोटीसे अधिक तेतीस सागरोपम-प्रमाण इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थानका उत्कृष्ट काल जानना चाहिए। चूर्णिसू०-चौदह, नौ और छह-प्रकृतिक संक्रमस्थानोका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल एक समय-कम दो आवली है। अथवा उपशमश्रेणीसे उतरनेवाले जीवकी अपेक्षा उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त भी पाया जाता है ॥२०६-२०८॥ शंका-एक-प्रकृतिक संक्रमस्थानका कितना काल है ? ॥२०९॥ ___ समाधान-एक-प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥२१०॥ चूर्णिसू०-अब एक जीवकी अपेक्षा संक्रमस्थानोका अन्तर कहते है ॥२११॥ शंका-सत्ताईस, छब्बीस, तेईस और इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थानोका अन्तर-काल कितना है ? ॥२१२॥
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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