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________________ गा० ५८ ] संक्रमस्थान-काल-निरूपण २९७ १९९. तेवीसाए संकामओ केवचिरं कालादो होइ ? २०० जहणेण अंतमुत्तं, एगसमओ वा । २०१. उकस्सेण छावद्विसागरोवमाणि सादिरेयाणि । २०२. बावीसाए बीसाए एगूणवीसाए अड्डारसहं तेरसहं बारसहं एक्कारसहं दसहं अट्टहं सत्तण्हं पंचण्हं चउन्हं तिन्हं दोन्हं पि कालो जहण्णेण एयसमओ । उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं । शेष रह जानेपर सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । तब उसके पच्चीस प्रकृतियो के संक्रमणका अभाव हो गया । इस प्रकार पच्चीस - प्रकृतिक संक्रामकका उत्कृष्टकाल उपार्धपुद्गलपरिवर्तन-प्रमाण सिद्ध हो जाता है । र्शका - तेईस प्रकृतिक संक्रमस्थानका कितना काल है ? ॥ १९९ ॥ समाधान - तेईस -प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त, अथवा एक समय और उत्कृष्ट साधिक छयासठ सागरोपमकाल है ॥२००-२०१॥ - विशेषार्थ — तेईस - प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त भी वतलाया गया है और एक समय भी । इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है - कोई उपशमसम्यग्दृष्टि जीव अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करके तेईस प्रकृतिक स्थानका संक्रामक हुआ । पश्चात् जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक तेईसका संक्रामक रहकर उपशमसम्यक्त्वके कालमे छह आवली शेप रह जानेपर सासादनगुणस्थानको प्राप्त होकर इक्कीस - प्रकृतिक स्थानका संक्रामक हो गया । यह अन्तर्मुहूर्तं जघन्य कालकी प्ररूपणा हुई । अब एक समयकी प्ररूपणा करते है - चौवीस प्रकृतियो की सत्तावाला कोई उपशमसम्यग्दृष्टि उपशमसम्यक्त्वके कालमे एक समय कम आवली. मात्र शेप रह जानेपर सासादनसम्यक्त्वको प्राप्त होकर इक्कीस - प्रकृतिक स्थानका संक्रामक हो गया । पुनः मिथ्यात्वको प्राप्त होकर एक समय तेईसका संक्रामक होकर तदनन्तर समय में अनन्तानुबन्धीके संक्रमणके निमित्तसे सत्ताईस - प्रकृतिक स्थानका संक्रामक हो गया । इस प्रकार तेईस - प्रकृतिक संक्रमस्थानका एक समयमात्र भी जघन्य काल सिद्ध हो जाता है । तेईस प्रकृतिक संक्रमस्थानके उत्कृष्ट कालकी प्ररूपणा इस प्रकार है - कोई एक मिथ्यादृष्टि जीव प्रथमसम्यक्त्वको प्राप्त होकर और उपशमसम्यक्त्वके कालके भीतर ही अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करके अन्तर्मुहूर्त तक तेईसका संक्रामक रहकर पुनः वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त हो करके छयासठ सागर तक परिभ्रमण कर अन्तमे दर्शन मोहकी क्षपणासे परिणत होकर मिध्यात्वका क्षय करके बाईस - प्रकृतिक स्थानका संक्रामक हो गया । इस प्रकार तेईस संक्रामकका आदिके अन्तर्मुहूर्तसे तथा मिध्यात्वकी चरमफालीके पतनसे लगाकर कृतकृत्यवेदकके चरम समय तक के अन्तर्मुहूर्त से अधिक छ्यासठ सागरोपम - प्रमाण उत्कृष्ट काल सिद्ध हो जाता है । चूर्णिसू० – बाईस, वीस, उन्नीस, अट्ठारह, तेरह, वारह, ग्यारह, दश, आठ, सात, पॉच, चार, तीन और दो - प्रकृतिक संक्रमस्थानोके संक्रमणका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ २०२॥ ३८
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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