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________________ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ संक्रम-अर्थाधिकार १९४. छब्बीससंकामओ केवचिरं कालादो होड़ १ १९५. जहणेण एगसमओ । १९६ उकस्सेण पलिदोत्रमस्त असंखेज्जदिभागो । १९७. पणुवीसाए संकामए तिष्णि भंगा । १९८. तत्थ जो सो सादिओ सपज्जवसिदो जहणेण एगसमओ । उक्कस्सेण उवडोग्गल परियÎ | २९६ प्रकृतिकी उद्वेलना करके छब्बीस प्रकृतियोका संक्रामक हो गया । इस प्रकार तीन पल्योपमके असंख्यात भागोसे अधिक एकसौ बत्तीस सागरोपम - प्रमाण सत्ताईस प्रकृतियो के संक्रमणका उत्कृष्ट काल सिद्ध हो जाता है । शंका छव्वीस - प्रकृतिक संक्रमस्थानका कितना काल है ? ॥ १९४ ॥ समाधान - छवीस प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमाण है ।। १९५-१९६॥ चूर्णिसू० – पच्चीस-प्रकृतिक सक्रमस्थान के कालके तीन भंग हैं । वे इस प्रकार हैंअनादि-अनन्त, अनादि - सान्त और सादि सान्त । इनमें जो सादि सान्त भंग है, उसकी अपेक्षा पच्चीस प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल उपार्थ - पुद्गलपरिवर्तन है ॥ १९७-१९८॥ विशेषार्थ - पच्चीस के संक्रामकके जघन्य कालका स्पष्टीकरण इस प्रकार हैछब्बीस प्रकृतियोका संक्रामक जो मिथ्यादृष्टि जीव सम्यग्मिध्यात्वकी उद्वेलना करता हुआ उपशमसम्यक्त्व के अभिमुख हो मिध्यात्वकी प्रथमस्थितिके द्विचरम समय मे सम्यग्मिथ्यात्व की चरम फालीको मिथ्यात्वरूपसे परिणमा कर पुन: चरम समयमे पच्चीस प्रकृतियोका संक्रामक होकर तदनन्तर समयमै फिर भी छव्वीस प्रकृतियोका संक्रामक हो गया। इस प्रकार एक समय मात्र जघन्यकाल प्राप्त होता है । अथवा अट्ठाईसकी सत्तावाला और सत्ताईसका संक्रामक जो उपशमसम्यग्दृष्टि उपायसम्यक्त्वके कालमे एक समय रहनेपर सासादनगुणस्थानको प्राप्त हुआ । वहॉपर एक समय पच्चीसके संक्रामक रूप से रहकर दूसरे समय में मिथ्यात्वको प्राप्त होकर सत्ताईसका संक्रामक हो गया । इस प्रकार भी पच्चीसके संक्रमणका जघन्य काल एक समय सिद्ध होता है । अथवा चौबीसकी सत्तावाला कोई उपशमसम्यग्दृष्टि अपने कालमें एक समय अधिक आवली -प्रमाण शेष रहने पर सासादनगुणस्थानको प्राप्त हुआ । वहॉपर अनन्तानुचन्वीका बन्ध करके और एक आवली काल बिताकर अन्तिम समयमे पच्चीसका संक्रामक हुआ और तदनन्तर समय मे मिध्यात्वको प्राप्त होकर सत्ताईसका संक्रामक हो गया । इस प्रकार से भी एक समयमात्र जघन्यकाल प्राप्त होता है । पच्चीसके संक्रामकके उत्कृष्टकालकी प्ररूपणा इस प्रकार है - कोई अनादिमिथ्यादृष्टि जीव अर्धपुलपरिवर्तनके आदि समय सम्यक्त्वको प्राप्त होकर और उसके साथ जघन्य अन्तर्मुहूर्तमात्र रह करके मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ। वहां पर सर्व लघुकालसे सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति की उद्वेलना प्रारंभ करके पच्चीसका संक्रामक हो गया । पुनः देशोन अर्थपुग परिवर्तनकाल तक संसार परिभ्रमण करके अन्तर्मुहूर्तमात्र संसार के
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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