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________________ गा० ५८ ] संक्रमस्थान-काल-निरूपण २९५ १९०. एयजीवेण कालो । १९१. सत्तवीसाए संकामओ केवचिरं कालादो होइ ? १९२. जहण्णेण अंतोमुहुत्तं । १९३ उक्कस्सेण वे छावट्टिसागरोवपाणि सादिरे - याणि पलिदोषमस्स असंखेज्जदिभागेण । आदि पर कुछ प्रकाश डाला जाता है- पच्चीस - प्रकृतिक स्थानका सादिसंक्रम भी होता है, अनादिसंक्रम भी होता है, ध्रुवसंक्रम, अध्रुवसंक्रम भी होता है । किन्तु शेष स्थानोका केवल सादिसंक्रम और अध्रुवसंक्रम ही होता है, अन्य नहीं । संक्रमस्थानो के स्वामित्वकी संक्षेपसे प्ररूपणा इस प्रकार जानना चाहिए - सत्ताईस, छब्बीस और तेईस - प्रकृतिक संक्रमस्थान सम्यग्दृष्टिके भी होते है और मिथ्यादृष्टि के भी होते है । पच्चीस - प्रकृतिक संक्रमस्थान मिध्यादृष्टि, सासादनसम्यदृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिके होता है । इक्कीस प्रकृतिक संक्रमस्थान सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिध्यादृष्टि के होता है । वाईस - प्रकृतिक संक्रमस्थान से लेकर एक प्रकृतिक संक्रमस्थान तकके सर्व संक्रमस्थान सम्यग्दृष्टिके चौथे गुणस्थानसे लगाकर ग्यारहवें गुणस्थान तक यथासंभव पाये जाते है । चूर्णिसू० ० - अब एक जीवकी अपेक्षा संक्रमस्थानोका काल कहते हैं ॥ १९०॥ शंका-सत्ताईस-प्रकृतिक संक्रमस्थानका कितना काल है ? ॥१९१॥ समाधान-सत्ताईस-प्रकृतिक संक्रमस्थानका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असंख्यातवें भागसे अधिक दो वार छयासठ सागरोपमकाल है ।।१९२-१९३॥ विशेषार्थ- सत्ताईस-प्रकृतिक संक्रमस्थानके जघन्यकालका स्पष्टीकरण इस प्रकार हैपच्चीस प्रकृतियो के संक्रामक किसी मिध्यादृष्टि जीवके उपशमसम्यक्त्वको ग्रहण कर और दूसरे समयसे सत्ताईस प्रकृतियोका संक्रामक होकरके जघन्य अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर पुनः उपशमसम्यक्त्वके कालके भीतर ही अनन्तानुबन्धीका विसंयोजन कर तेईस प्रकृतियोका संक्रामक हो जानेपर सत्ताईस - प्रकृतिक संक्रमस्थानका अन्तर्मुहूर्त प्रमाण जघन्यकाल सिद्ध हो जाता है । अथवा सम्यग्मिथ्यादृष्टिके सम्यक्त्व या मिथ्यात्वको प्राप्त होकर और सर्व - जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक उसके साथ रहकर पुनः परिणामो के निमित्त से सम्यग्मिथ्यात्वको प्राप्त करनेपर भी सत्ता - ईस - प्रकृतियो के संक्रमणका अन्तर्मुहूर्तमात्र जघन्यकाल प्राप्त हो जाता है । उत्कृष्टकालका स्पष्टीकरण इस प्रकार है - कोई एक अनादिमिध्यादृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करके सत्ताईस प्रकृतियोका संक्रामक होकर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ और पल्योपमके असंख्यातवें भागतक उद्वेलना करता हुआ रहा तथा संक्रमणके योग्य सम्यक्त्वप्रकृति के सत्त्वके साथ सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और उसके साथ प्रथम वार छयासठ सागरोपमकाल तक परिभ्रमण - कर उसके अन्तमे मिथ्यात्वको प्राप्त होकर पहले के समान ही पल्योपमके असंख्यातवें भागमात्र कालतक सम्यक्त्वप्रकृति की उद्वेलना करता रहा । अन्त में उसकी उद्वेलना - घरमफालीके - साथ सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ और दूसरी वार भी उसके साथ छयासठ सागरोपमकाल तक परिभ्रमण करके अन्तमे मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ । फिर भी दीर्घ उद्वेलनाकालसे सम्यक्त्व
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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