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________________ गा० ५८] संक्रमस्थान-प्रकृति-निरूपण २९३ १७४. अट्ठण्हं एक्कावीसदिकम्मंसियस्स तिविहे कोहे उवसंते सेसेसु कसाएसु अणुवसंतेसु । १७५. अहवा चउवीसदिकस्मंसियस्स दुविहे माणे उपसंते, माणसंजलणे अणुवसंते । १७६. सत्तण्हं चउवीसदिकम्मंसियस्स तिविहे माणे उवसंते सेससु कसाएसु अणुवसंतेसु । १७७. छण्हमेकावीसदिकम्मंसियस्स दुविहे माणे उवसंते सेसेसु कसाएसु अणुवसंतेसु । १७८. पंचण्हमेकावीसदिकम्मंसियस्स तिविहे माणे उवसंते सेसकसाएसु अणुवसंतेसु । १७९. अधवा चउवीसदिक-मंसियस्स दुविहाए मायाए उवसंताए सेसेसु अणुवसंतेसु ।१८०. चउण्हं खवगस्स छसु कम्मेसु खीणेसु पुरिसवेदे अक्खीणे । १८१. अहवा चउवीसदिकम्मंसियस्स तिविहाए मायाए उवसंताए सेसेसु अणुवसंतेसु । १८२ संक्रमण करनेवाले क्षपकके भी हास्यादि छह प्रकृतियोके एक साथ क्षीण होनेपर चार-प्रकृतिक संक्रमस्थानकी उत्पत्ति देखी जाती है, इसलिए क्षपकके नौ प्रकृतियोका संक्रमण नहीं होता है। - चूर्णि सू०-इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले क्षायिकसम्यक्त्वी उपशामकके तीन प्रकारके क्रोधके उपशान्त होनेपर और शेष कषायोके अनुपशान्त रहने तक आठ प्रकृतियोका संक्रमण होता है । अथवा चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके दोनो मध्यम मानकषायोके उपशान्त होनेपर और संज्वलनमानके अनुपशान्त रहनेपर आठ प्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है। चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके तीनो प्रकारके मानकषायके उपशान्त होनेपर और शेप कपायोके अनुपशान्त रहनेपर सात प्रकृतियोका संक्रमण होता है । इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके दोनो प्रकारके मानकपायके उपशान्त होनेपर और शेष कपायोके अनुपशान्त रहनेपर छह प्रकृतियोका संक्रमण होता । इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके तीनो प्रकारके मानके उपशान्त होनेपर और शेप कपायोके अनुपशान्त रहनेपर पॉच प्रकृतियोका संक्रमण होता है। अथवा चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके दोनो प्रकारकी मायाकषायके उपशान्त होनेपर और शेष कर्मों के अनुपशान्त होनेपर पाँचप्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है ॥१७४-१७९॥ विशेषार्थ-पाँच-प्रकृतिक संक्रमस्थानकी प्ररूपणा दो प्रकारसे की गई है। उसमेसे प्रथम प्रकारमे तो 'शेष कषायोके अनुपशान्त रहनेपर' ऐसा कहा है और द्वितीय प्रकारमें 'शेप कर्मोंके अनुपशान्त रहनेपर' ऐसा कहा है, इसका कारण यह है कि प्रथम प्रकारवाले जीवके तो तीन माया और दो लोभ इन पॉच कषायोका संक्रमण पाया जाता है। किन्तु दूसरे प्रकारवालेके मायासंज्वलन दो लोस और दर्शनमोहनीयकी मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये दो, इस प्रकार पाँच प्रकृतियोका संक्रम पाया जाता है। इस विभिन्नताको सूचित करनेके लिए चूर्णिकारने उक्त दो विभिन्न पदोका प्रयोग किया है । __चूर्णिसू०-क्षपकके स्त्रीवेदकी क्षपणाके अनन्तर छह नोकषायोके क्षीण होनेपर और पुरुषवेदके अक्षीण रहनेपर पुरुपवेद, संज्वलनक्रोध, मान और माया, इन चार प्रकृतियोका संक्रमण होता है। अथवा चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके तीन प्रकारकी माया
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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