SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 400
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २९२ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार वारसण्हं खवगस्स आणुपुचीसंकमो आढत्तो जाव णबुसयवेदो अक्खीणो । १६६. एकावीसदिकस्मंसियस्स वा छसु कम्मेसु उवसंतेसु पुरिसवेदे अणुवसंते । १६७. एक्कारसण्हं खवगस्स णउंसयवेदे अक्खीणे । १६८. अधवा एकाचीसदिकम्मंसियस पुरिसवेदे उवसंते अणुवसंतेसु कसाए सु । १६९. चउवीसदिकम्मंसियस्स या दुविहे कोहे उवसंते कोहसंजलणे अणुवसंते । १७०. दसण्हं खबगस्स इस्थिवेदे खीणे छसु कम्मसेसु अक्खीणेसु । १७१. अधवा चउवीसदिकम्पसियस्स कोधसंजलणे उवसंते सेसेसु कसाएसु अणुवसंतेसु । १७२. णवण्हं एकावीसदिसम्मंसियस्स दुविहे कोहे उवसंते कोहसंजलणे अणुवसंते । १७३. चवीसदिकम्मंसियस्स खवगस्स च णत्थि । तेरह प्रकृतियोके संक्रमण करनेवाले क्षपकके आनुपूर्वी-संक्रम आरम्भ कर जबतक नपुंसकवेद क्षीण नहीं होता, तवतक बारह प्रकृतियोका संक्रमण होता है । अथवा इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके हास्यादि छह कर्मोके उपशान्त होनेपर और पुरुषवेदके अनुपशान्त रहने तक वारह प्रकृतियोका संक्रमण होता है। बारह प्रकृतियोके संक्रमण करनेवाले उसी क्षपकके नपुंसकवेदके क्षय कर देनेपर और स्त्रीवेदके क्षीण नहीं होने तक तीन संज्वलन और आठ नोकपाय इन ग्यारह प्रकृतियोका संक्रमण होता है । अथवा इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले क्षायिकसम्यक्त्वी उपशासकके पुरुपवेदके उपशान्त होनेपर और अवशिष्ट कयायोके अनुशान्त रहनेपर भी ग्यारह प्रकृतियोका संक्रमण होता है। अथवा चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके दोनो मध्यम क्रोधोके उपशान्त होनेपर और संज्वलनक्रोधके अनुपशान्त रहनेपर भी ग्यारह प्रकृतियोका संक्रमण होता है। ग्यारह प्रकृतियोका संक्रमण करनेवाले क्षपकके स्त्रीवेदके क्षीण हो जानेपर और छह नोकपायोके अक्षीण रहने तक तीन संज्वलन और सात नोकपाय, इन दश प्रकृतियोका संक्रमण होता है। अथवा चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके संज्वलनक्रोधके उपशान्त होनेपर और शेप कपायोके अनुपशान्त रहनेपर भी दश प्रकृतियोका संक्रमण होता है । इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले क्षायिकसम्यक्त्वी उपशामकके दोनो क्रोधोके उपशान्त होनेपर और संज्वलनक्रोधके अनुपशान्त रहने तक शेप नौ प्रकृतियोका संक्रमण होता है। यह नौ-प्रकृतिक संक्रमस्थान चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपनामकके और पकके नहीं होता है ॥१६२-१७३।। विशेपार्थ-चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके नौ-प्रकृतियोका संक्रमण क्या नहीं होता, इस प्रश्नका उत्तर यह है कि चौबीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामकके संज्वलनक्रोधका उपशमन करने के उपरान्त जब दोनो मध्यम मानकपाय उपशान्त हो जाते है, तव उसके उससे अधस्तन संक्रमस्थानकी उत्पत्ति होती है। तथा स्त्रीवेदके क्षयके साथ दश प्रकृतियाँके १. ओदरमाणसंबधेण कि पयदसकमाणसभवो वत्तव्यो, सुत्तत्सेदस्म देसामासवभावेणाबछाणादो। जयध० २. ओदरमाणसंबंधेण वि एत्थ पयदसकमठाणसभवो वत्तव्यो, विरोहाभावादो । जयध° connnnnnnnnnnnnnnnn
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy