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________________ २७६ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार कोहादी उवजोगे चदुसु कसाएसु चाणुपुब्बीए । सोलस य ऊणवीसा तेवीसा चेव तेवीसा ॥४६॥ और ग्यारह-प्रकृतिक दोनो संक्रमस्थान पाये जाते हैं। पुरुपवेदी जीवके तेरह संक्रमस्थान होते हैं। उनमे ग्यारहकी प्ररूपणा तो स्त्रीवेदीके ही समान है। विशेप इसके अट्ठारह और दश-प्रकृतिक दो संक्रमस्थान और अधिक होते हैं, क्योकि इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामक और क्षपकके पुरुषवेदके उदयके साथ श्रेणीपर चढ़कर स्त्रीवेदके उपशमन और क्षपण करनेपर यथाक्रमसे उक्त दोनो संक्रमस्थान पाये जाते है । ___ अव कपायमार्गणामे संक्रमस्थानोका निरूपण करते है क्रोधादि चारों कपायोंसे उपयुक्त जीवोंमें आनुपूर्वीसे सोलह, उन्नीस, तेईस और तेईस संक्रमस्थान होते हैं ॥४६॥ विशेषार्थ-क्रोधकपायके उदयसे युक्त जीवके सोलह संक्रमस्थान होते है। उनका विवरण इस प्रकार है-कोधकपायी जीवके सत्ताईससे लेकर इक्कीस तकके छह संक्रमस्थान तो मिथ्याष्टि आदि श्रेणीके पूर्ववर्ती गुणस्थानोमे यथासम्भव रीतिसे पाये ही जाते है । चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाला जो जीव क्रोधकपायके उदयके साथ श्रेणीपर चढ़ता है, उसके तेईस, बाईस और इक्कीस-प्रकृतिक संक्रमस्थान तो पुनरुक्त ही पाये जाते है। पुनः उसके बीस, चौदह और तेरह ये तीन स्थान अपुनरुक्त पाये जाते है । तथा इक्कीस प्रकृतियोंकी सत्तावाले उपशामझकी अपेक्षा उन्नीस, अट्ठारह, वारह और ग्यारह-प्रकृतिक चार संक्रमस्थान पाये जाते है। क्रोधकषायके साथ श्रेणीपर चढ़े हुए आपककी अपेक्षा दश, चार और तीन-प्रकृतिक संक्रमस्थान और पाये जाते है । इस प्रकार सव मिलाकर क्रोधकपायी जीवके २७, २६, २५, २३, २२, २१, २०, १९, १८, १४, १३, १२, ११, १०, ४ और ३ ये सोलह संक्रमस्थान पाये जाते है । मानकषायी जीवके इन सोलह संक्रमस्थानोके अतिरिक्त इक्कीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपशामककी अपेक्षा दोनों प्रकारके क्रोधोके उपगम होनेपर नौ-प्रकृतिक संक्रमस्थान और संज्वलनक्रोधके उपगम होनेपर आठ-प्रकृतिक संकमस्थान, तथा आपकके संज्वलनक्रोधका क्षय होनेपर दो-प्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है । इस प्रकार सब मिलाकर मानकपायी जीवके २७, २६, २५, २३, २२, २१, २०, १९, १८, १४, १३, १२, ११, १०, ९, ८, ४ और २ प्रकृतिक उन्नीस संक्रमस्थान पाये जाते है । माया और लोभकषायवाले जीवोके सभी अर्थात् तेईस तेईस ही संक्रमस्थान पाये जाते है। अकषायी जीवके एकमात्र दो-प्रकृतिक संक्रमस्थान है, क्योकि चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाले उपनामक जीवके ग्यारहवें गुणस्थानमे दो प्रकृतियोका संक्रमण पाया जाता है। अब ज्ञानमार्गणामें संक्रमस्थानोका निरूपण करते हैं
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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