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________________ २७४ कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार तेवीस सुक्कलेस्से छक्कं पुण तेउ-पम्मलेस्सासु । पणयं पुण काऊए णीलाए किण्हलेस्साए ॥४४॥ अवगयवेद णqसय-इत्थी-पुरिसेसु चाणुषुवीए। अटारसयं णवयं एकारसयं च तेरसया ॥४५॥ सत्तावाले जीवकी अपेक्षा एकमात्र दो-प्रकृतिक संक्रमस्थान पाया जाता है। गाथा-पठित 'मिश्र' पदसे संयतासंयतका ग्रहण किया गया है । उसके २७, २६, २३, २२ और २१ प्रकृतिक पांच संक्रमस्थान होते है, ऐसा अभिप्राय जानना चाहिए। अब लेश्यामार्गणाकी अपेक्षा संक्रमस्थानोंका निरूपण करते हैं शुक्ललेश्यामें तेईस संक्रमस्थान होते हैं । तेजोलेश्या और पद्मलेश्यामें सत्ताईससे लेकर इक्कीस तकके छह संक्रमस्थान होते हैं। कापोतलेश्यामें सत्ताईस, छब्बीस, पच्चीस, तेईस और इक्कीस-प्रकृतिक पॉच संक्रमस्थान होते हैं । ये ही पाँच संक्रमस्थान नील और कृष्णलेश्यामें भी जानना चाहिए ॥४४॥ विशेषार्थ-शुक्ललेश्यावाले जीवोके सभी संक्रमस्थान पाये जाते है । तेजोलेश्या और पद्मलेश्यावाले जीवोके २७, २६, २५, २३, २२ और २१ प्रकृतिक छह संक्रमस्थान पाये जाते है। कापोत, नील और कृष्णलेश्यावाले जीवोके २७, २६, २५, २३ और २१ प्रकृतिक पॉच संक्रमस्थान पाये जाते है। यतः इक्कीससे नीचेके संक्रमस्थान उपशम या क्षपकश्रेणीमे ही संभव है और वहॉपर एकमात्र शुक्ललेश्या होती है, अतः शेष पांचो लेश्याओंमे बीस आदि संक्रमस्थानोका अभाव बतलाया गया है। अव वेदमार्गणाकी अपेक्षा संक्रमस्थानोका निरूपण करते है अपगतवेदी, नपुंसकवेदी, स्त्रीवेदी और पुरुपवेदी जीवोंमे आनुपूर्वीसे अर्थात् यथाक्रमसे अट्ठारह, नौ, ग्यारह और तेरह संक्रमस्थान होते हैं ॥४५॥ विशेषार्थ-नौवे गुणस्थानके अवेदभागसे ऊपरके जीवोको अपगतवेदी कहते हैं । उनके २७, २६, २५, २३ और २२ इन पाँच स्थानोको छोड़कर शेप अट्ठारह स्थान पाये जाते है । इनका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-चौवीस प्रकृतियोकी सत्तावाला उपशामक जीव पुरुपवेदके उदयके साथ श्रेणीपर चढ़ा और अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमे लोभका असंक्रामक होकर क्रमसे स्त्रीवेद नपुंसकवेद, और छह नोकषायोका उपशमन करता हुआ अपगतवेदी होकर चौदह-प्रकृतिकस्थानका संक्रमण करता है १ । पुनः पुरुषवेदके नवकवन्धका उपशमन करके तेरह-प्रकृतिक स्थानका संक्रमण करता है २। पुनः दो प्रकारके क्रोधका उपशम करनेपर ग्यारह-प्रकृतिक स्थानका संक्रमण किया ३ । पुनः संचलन क्रोधका उपाम करनेपर दशप्रकृतिक स्थानका संक्रमण किया ४ । पुनः दो प्रकारके मानका उपशम करनेपर आठ-प्रकृतिक स्थानके संक्रमभावको प्राप्त हुआ ५ । पुनः संज्वलनमानके उपशम करनेपर सात-प्रकृतिक
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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