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________________ कसायपाहुडसुत अर्थात् जिसकी शब्द- रचना संक्षिप्त हो, और जिसमें सूत्रगत अशेष अर्थोका संग्रह किया गया हो, सूत्रके ऐसे विवरणको वृत्तिसूत्र कहते हैं । १६ वृत्तिसूत्रका उक्त लक्षण यतिवृपभके चूर्णिसूत्रों पर पूर्णरूपसे घटित होता है । उनको शब्द-रचना संक्षिप्त है, और सूत्र - सूचित समस्त अर्थीका उनमें विवरण पाया जाता है | पर इतना होने पर भी यह बात तो अन्वेषणीय बनी ही रहती है कि आखिर इस 'चूर्णि' पदका अर्थ क्या है और क्यों यतिवृपभके इन वृत्तिसूत्रोको 'चूर्णिसूत्र' कहा जाता है। श्वे० आगमों पर भी चूर्णियां रची गई हैं, पर उन्हें या उनमें से किसीको भी 'चूर्णि सूत्र' नाम दिया गया हो, ऐसा हमारे देखने में नहीं आया । श्वे० ग्रन्थोंमें एक स्थान पर 'चूर्णिपद' का लक्षण इस प्रकार दिया गया है अत्थबहुलं महत्थं हेउ -निवाश्रवसग्गगंभीरं । बहुपायमवोच्छिन्नं गम-णयसुद्धं तु चुण्णपयं ।। अर्थात् जो अर्थ बहुल हो, महान् अर्थका धारक या प्रतिपादक हो, हेतु, निपात और उपसर्गसे युक्त हो, गम्भीर हो, अनेक पाद-समन्वित हो, अव्यवच्छिन्न हो, अर्थात् जिसमे वस्तुका स्वरूप धारा प्रवाह से कहा गया हो, तथा जो अनेक प्रकारके गम— - जानने के उपाय और नयोंसे शुद्ध हो, उसे चौर्ण अर्थात् चूर्णिसम्बन्धी पद कहते हैं । चूर्णिपदकी यह व्याख्या यतिवृषभाचार्य के चूर्णिसूत्रोंपर अक्षरशः घटित होती है । चूर्णिपदका इतना स्पष्ट अर्थ जान लेनेके पश्चात् भी यह शका तो फिर भी उठती है कि 'वृत्ति' के स्थान पर 'चूर्ण' पदका प्रयोग क्यों किया गया और जैनसाहित्य में ही क्यों यह पद अधिकता से व्यवहृत हुआ ? जब कि जैनेतर साहित्य में वृत्ति, विवृति आदि नाम ही व्यवहृत एवं प्रचलित दृष्टिगोचर होते हैं ? 'चूर्णि ' पदकी निरुक्ति पर ध्यान देनेसे हमें उक्त शंकाका समाधान मिल जाता है । संस्कृत में चूर्ण धातु पेपण या विश्लेषण के अर्थ में प्रयुक्त होती है । किसी गेहूं चना आदि बीजके पिसे हुए अंशको चूर्ण कहते हैं और अनेक प्रकारके चूके समुदायको चूणि कहते हैं । तीर्थंकर भगवान् की दिव्यध्वनिको अनन्त अर्थसे गर्भित X वीजपद रूप कहा गया है और बीजपढ़का लक्षण धवलामें इस प्रकार दिया गया है संखितसद्दरयण मणं तत्थावगमहेदुभूदा रोगलिंग संगयं बीजपदं णाम || ( धवला श्र० ५० ५३६ ) अर्थात् जिसकी शब्द रचना सक्षिप्त शब्दों से हुई हो, जो अनन्त अर्थो के ज्ञान के कारणभूत हो, अनेक प्रकार के लिंग या चिन्होंसे संगत हो, ऐसे पढ़को बीजपद कहते हैं | कसा पाहुडकी गाथासूत्रोंमें ऐसे वीजपद प्रचुरतासे पाये जाते हैं । उन वीजपदोंका आ० यतिवृपने अपनी प्रस्तुत वृत्ति में बहुत उत्तम प्रकारसे विपलेश्ण - पूर्वक विवरण किया है, अतः उनकी यह वृत्ति चूर्णिके नामसे प्रसिद्ध हुई है । कसायपाहुढकी गाथाओंमे किस प्रकारके या कौनसे बीज पद प्रयुक्त हुए हैं और व किस प्रकार अनन्त अर्थसे गर्भित हैं, तथा उनका प्रस्तुत चूर्णि सूत्रोंमें किस प्रकार से विश्लेपण छ देखो श्रभिधानराजेन्द्र 'चुगपद' | x श्रणं तत्यगभ वीजपद घडिय सरीरा । जयघ० भा० १५० १२६
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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