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________________ प्रस्तावना इस विवेचनसे जहां उक्त प्रश्नका भलीभॉति समाधान होता है, वहां यह एक विशिष्ट बात भी अभिज्ञात होती है कि गुणधराचार्य महाकम्मपयडिपाहुडके पूर्ण वेत्ता थे। तथा जिस प्रकार गुणधराचार्यने अपने समयमें पंचम पूर्वगत पेज्जदोसपाहुडका ज्ञान विलुप्त होते हुए देखकर उसका कसायपाहुडके रूपमें उपसंहार करना उचित समझा,ठीक उसी प्रकारसे धरसेनाचार्यने अपने समयमें दिन-पर-दिन महाकम्मपयडिपाहुडके ज्ञानको विलुप्त होते हुए देखकर तथा अपनी अल्पायुपर ध्यान देकर श्रुतरक्षाके विचारसे भूतबलि और पुष्पदन्तको बुलाकर उसे समर्पण करना उचित समझा । इससे गुणधराचार्यका धरसेनाचार्यसे पूर्ववर्ती होना और भी असंदिग्धरूपसे स्वतः सिद्ध हो जाता है। गाथासूत्रोंके पठन-पाठनके अधिकारी--गाथासूत्रोंकी रचना-शैलीको देखते हुए यह सहजमें ही ज्ञात हो जाता है कि इनकी रचना उच्चारणचार्यों, व्याख्यानाचार्यों या वाचकाचार्योको लक्ष्यमें रखकर की गई है, जो कि उस समय प्रचुरतासे पाये जाते थे । ये लोग एक प्रकारसे उपाध्यायपरमेष्ठी हैं । यदि ये व्याख्यान करनेवाले आचार्य गाथाओंके अन्तर्निहित अर्थका शिष्योंको व्याख्यान न करते, उन्हें स्पष्ट प्रकट करके न बतलाते, तो उनका अर्थ-परिज्ञान असंभव-सा था। इसका कारण यह है कि अनेक गाथासूत्र केवल प्रश्नात्मक हैं और उनमें प्रतिपाद्य विषयका कुछ भी प्रतिपादन नहीं करके उसके प्रतिपादनका संकेतमात्र किया गया है। गुरु-परम्परासे प्राप्त अर्थका अवधारण करनेवाले आचार्योंके बतलाये विना उनके अर्थका ज्ञान हो नहीं सकता है। जो प्रश्नात्मक या पृच्छासूत्रात्मक गाथाएं हैं, उन्हें एक प्रकारके नोट्स, यादी-विषयको स्मरण करानेवाली सूची--या तालिका कहना चाहिए । गाथासूत्रोंमें आये हुए 'एव सव्वत्थ कायव्वं जैसे पदोंके द्वारा भी इसी बातकी पुष्टि होती है । यही कारण है कि गुणधरप्रथित उक्त गाथाएं आचार्य-परम्परासे व्याख्यात होती हुई आर्यमंच और नागहस्ती जैसे महावाचकोंको प्राप्त हुई, जोकि अपने समयके सर्व-वाचकों या व्याख्यानाचार्योंमें शिरोमणि, अग्रणी, या सर्वश्रेष्ठ थे और यही कारण है कि उन दोनोंसे यतिवृषभने गाथासूत्रोंके अर्थका सम्यक प्रकारसे अवधारण किया। कसायपाहुडके चूर्णिसूत्रोंपर एक दृष्टि जयधवलाकारके उल्लेखानुसार श्रा० यतिवृषभने आर्यमंतु और नागहस्ती के पास कसायपाहुडकी गाथाओंका सम्यक् प्रकार अर्थ अवधारण करके सर्व प्रथम उन पर चूर्णिसूत्रो की रचना की । आ० इन्द्रनन्दिके श्रुतावतारसे भी इसकी पुष्टि होती है । दोनोंने ही उनके इन चूर्णिसूत्रोंको वृत्तिसूत्र कहा है।। धवला और जयधवला टीकाओंमें चूर्णिसूत्रोंका सहस्रों वार उल्लेख होने पर भी चूर्णिसूत्रका कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं हुआ। हां, वृत्तिसूत्रका लक्षण जयधवलामें अवश्य उपलब्ध है, जो कि इस प्रकार है सुत्तस्सेव विवरणाए सखिचसद्दरयणाए संगहियसुत्तासेसत्थाए वित्तिसुत्तववएसादो। (जयध० अ० प० ५२) * पृ० ६०५, गा० ८५ । * पुणो तेसिं दोण्ह पि पादमूले असीदिसदगाहाणं गुणहरमुहकमलविरिणग्गयाणमत्यं सम्म सोऊण जयिवसहभडारएण पवयरणवच्छलेण चुएिणसुत्त कय । जयघ० भा० १ पृ० ८८.. - तेन ततो यतिपतिना तद्गाथावृत्तिसूत्ररूपेण । रचितानि षट्सहस्रग्रन्थान्यथ चूर्णिसूत्राणि ॥ इन्द्र० श्रु० श्लो० १५६. + सो वित्तिसुत्तकत्ता जइवसहो मे वर देऊ ॥ जयघ० भा० १ पृ० ४.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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