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________________ कसायपाहुडसुत्त यदि इन गाथासूत्रोंमें अन्तर्निहित अनन्त अर्थको चूर्णिकार व्यक्त न करते, तो आज उनका अर्थबोध होना असंभव था। ८. एक प्रश्न-जबकि कसायपाहुडको पन्द्रह अधिकारोंमें विभक्त किया गया है और सभी अधिकारोंकी गाथाएं भी पृथक्-पृथक् निरूपण की गई हैं, तब क्या कारण है कि प्रारम्भके ५ अधिकारोंमें केवल ३ गाथाएं ही बतलाई गई हैं ? क्या वेदक, उपयोग, व्यंजन आदि शेष अधिकारोंके समान प्रारम्भके ५ अधिकारों में भी थोड़ी बहुत गाथाओंको नहीं रचा जा सकता था ? यदि हां, तो फिर क्यों नहीं वैसा किया गया, और क्यों ३ गाथाओंके द्वारा ही ५ अधिकारोंके प्रतिपाद्य विपयका निर्देश कर दिया गया? यह एक प्रश्न ग्रन्थके प्रत्येक अभ्यासीके हृदयमें उठे विना नहीं रह सकता ? यद्यपि इस प्रश्नका उत्तर सहज नहीं है, तथापि गुणधराचार्यके समयकी स्थितिका अध्ययन करनेसे उक्त प्रश्नका बहुत कुछ समाधान हो जाता है । प्रारम्भके ५ अध्यायों पर रचे गये चूर्णिसूत्रोंके अध्ययनसे पता चलता है कि इन अधिकारोंका प्रतिपाद्य विषय वही है, जोकि महाकम्मपयडिपाहुडमें वर्णन किया गया है । कसायपाहुडका उद्गमस्थान पांचवें पूर्वकी दशवीं वस्तुका तीसरा पेज्जदोसपाहुड है, जबकि महाकम्मपयडिपाहुड दूसरे पूर्वकी पंचम वस्तुका चौथा पाहुड है । गुणधराचार्य पांचवें पूर्वके पूर्ण पाठी भले ही न हों, पर उसके एक देशपाठी तो निश्चयतः थे ही । अतः यह अर्थापत्तिसे सिद्ध है कि वे महाकम्मपयडिपाहेडके भी पारंगत थे। उनके द्वारा कसायपाहुडका रचा जाना यह सिद्ध करता है कि उनके समयमें उक्त पंचम पूर्वगत पाहुडोंके ज्ञानका भी हास होने लगा था । साथ ही कसायपाहुडके प्रारम्भिक ५ अधिकारोंपर गाथासूत्रोंका न रचा जाना और मात्र ३ गाथाओंके द्वारा उनके प्रतिपाद्य विपयकी सूचनामात्र करना यह सिद्ध करता है कि यतः उनके समयमें महाकम्मपयडिपाहुडका पठन-पाठन अच्छी तरहसे प्रचलित था, अत. उन्होंने उन अधिकारोंपर गाथाओंकी रचना करना अनावश्यक समझा और मात्र ३ गाथाओंके द्वारा उसकी सूचना करदी। किन्तु कसायपाहुडकी गाथाओंको यतिवृपभके पास तक पहुंचते-पहुंचते मध्यवर्ती कालमें महाकम्मपयडिपाहुडके ज्ञानका बहुत कुछ अंशोंमे विच्छेद हो गया था, और जो कुछ उसका आशिक-ज्ञान बचा था, वह पखंडागम, कम्मपयडी, आदि प्रकीर्णक ग्रन्थोंमे निबद्ध हो चुका था, अतः उन्होंने प्रारम्भके ५ अधिकारोंका विशद व्याख्यान करना उचित समझा । यही कारण है कि जब गुणधराचार्यने प्रारम्भके ५ अधिकारोंपर केवल ३ गाथाएं रची, तब यतिवृपभने उनपर ३२४१ चूर्णिसूत्र रचे, जो कि समस्त चर्णिसूत्रोंकी संख्याके आधेके लगभग हैं; क्योंकि कसायपाहुडके समस्त चूर्णिसूत्रोंकी संख्या ७००६ है। यहां एक वात और भी ज्ञातव्य है कि प्रारम्भके पांच अधिकारोंके चूर्णिसूत्रोंकी उक्त संख्या वास्तवमें पांचकी नहीं, अपि तु चारकी ही है, क्योंकि बन्धनामक चौथे अधिकारपर तो यतिवृपभने मात्र ११ सूत्रों के द्वारा प्रतिपाद्य विषयकी सूचना भर की है और उनमे स्पष्टरुपसे यह कहा है कि बन्धके चारों भेदोंका अन्यत्र बहुत विस्तारसे वर्णन किया गया है (अतः हक उनका वर्णन यहां नहीं करते हैं )। जयधवलाकार इस स्थलपर लिखते है कि यहाँ पर समस्त महावन्धके-जिसका कि प्रमाण ३० हजार श्लोकपरिमाण हैं-प्ररूपण करने पर बन्धनामक चौथा अधिकार पूर्ण होता है । यदि तिवृपभ संक्रमण अधिकारके समान अति संक्षेपसे भी चारों प्रकारके बन्धोंका निरूपण करते, तो भी उक्त अधिकारके चूर्णिसूत्रोंकी संख्या लगभग दो हजारके अवश्य होती, क्योंकि अकेले संक्रमण अधिकारके चूर्णिसूत्रोंकी संख्या१८५३ है, जबकि बहुतसे अनुयोगद्वारोंके विवेचनका भार चूर्णिकारने उच्चारणाचार्यों पर छोड़ा है । यदि संक्रमणके समान बन्ध अधिकारके चूर्णिसूत्रोंकी काल्पनिक संख्या दो हजार ही मानी जावे, तो प्रारम्भके ५ अधिकारोंके चूर्णिसूत्रोंकी संख्या कम-से-कम ५ हजार अवश्य होती।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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