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________________ प्रस्तावना व्याख्यान किया गया है, ऐसी गाथाओंको चूर्णिकारने 'एदं सव्वं वागरणसुतं' कहकर उन्हें व्याकरणगाथासूत्र संज्ञा दी है। चारित्रमोहक्षपणाकी दो एक गाथाओंको छोड़कर सभी भाष्यगाथाओंको व्याकरणसूत्र जानना चाहिए। शेष अधिकारोंमें भी इस प्रकारके विपयका वर्णन करनेवाले व्याकरणसूत्र पाये जाते है । मूल गाथाओं में उनकी संख्या इस प्रकार है-१७ से २०, २२ से २७, २९, ३०, ३२ से ३७, ४२ से ६१, ६८, ६६, ७२, ७६ से ७८ से १८,६० से ६३, ६५ से १७, ६६ से १०१, १०३, १०५ से १०८, ११० से ११२, ११४, ११५, ११७ से १२८, १३० से १३२, १३४ से १३७, १३६, १४०, १४२ से १४५, १४७ से १५०, १५२, १५३, १५५ से १५६, १६२, १६४, १७० से १७५, १७७ और १७८ ।। उक्त विभाजन १८० मूलगाथाओंका है । शेष रही ५३ गाथाओंका वर्गीकरण इस प्रकार है-सम्बन्ध-गाथाएं, अद्धापरिमाण-गाथाएं और संक्रमवृत्ति-गाथाएं। सम्बन्ध गाथाओंमे प्रस्तुत ग्रन्थके १५ अधिकारोंकी गाथाओंका निर्देश किया गया है; अतएव इनको विषयानुक्रमणी या विषयसूचीरूप होनेसे सूचनासूत्र कहा जा सकता है। श्रद्धापरिमाणकी १२ गाथाओंमें कालके अल्पबहुत्वका तथा संक्रमवृत्तिकी ३५ गाथाओंमें संक्रमणका विवेचन होनेसे उन्हें व्याकरणसूत्र मानना चाहिए। ६.व्यवस्थाभेद-गाथासूत्रकारने चारित्रमोहनीयकर्मके प्रस्थापक (क्षय करनेवाले)जीवके विषयमे 'संकामयपट्टवयरस परिणामो केरिसो हवे' इससे लेकर 'किंद्विदियाणि कम्माणि' इस गाथा तककी चार गाथाओंको चारित्रमोहक्षपणाधिकारके अन्तर्गत कहा है, फिर भी चूर्णिकारने उन्हें दर्शनमोहके उपशमको प्रारम्भ करनेवाले जीवकी प्ररूपणाके समय सम्यक्त्व-अधिकारके प्रारम्भमें कहा है और उनपर वही चूणिसूत्र भी रचे है। पर इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिए, क्योंकि गाथासूत्रकारने उन्हे अन्तदीपकरूपसे चारित्रमोहक्षपणाधिकारमें कहा है, किन्तु चूर्णिकारने आदिदीपकरूपसे उनका प्रतिपादन दर्शनमोहोपशमनाप्ररथापकके विषयमें किया है। उन चारों गाथाओंका प्रतिपादन दर्शनमोहोपशम-प्रस्थापकके समान दर्शनमोहक्षपणाप्रस्थापक', संयमासंयम-प्रस्थापक, संयमप्ररथापक", चारित्रमोहोपशमना-प्रस्थापक, और चारित्रमोहक्षपणा-प्रस्थापकके लिए भी आवश्यक है । यही कारण है कि दर्शनमोहोपशनाप्रस्थापकका आश्रय लेकर प्रारंभमें ही चूर्णिकारने उन चारों ही गाथाओंकी विभाषा ( व्याख्या) की है और आगे उक्त चारों अधिकारोंके आरम्भमें समर्पण-सत्रोंके द्वारा उन चारों ही गाथाओंकी विभाषा करनेके लिए उच्चारणाचार्यों और व्याख्यानाचार्योंको सूचना कर दी है । यदि चूर्णिकार ऐसा न करते, तो अभ्यासीको यह पता भी न लगता, कि उन गोथाओंके व्याख्यानकी आवश्यकता इसके पूर्व भी उक्त स्थलों पर है। ७. गाथाओंकी गम्भीरता और अनन्तार्थगर्भिता-कसायपाहडकी किसी-किसी गाथाके एक-एक पदको लेकर एक-एक अधिकारका रचा जाना तथा तीन गाथाओंका पांच अधिकारों में निबद्ध होना ही गाथासूत्रोंको गम्भीरता और अनन्त-अर्थ-गर्भिताको सचित करता है । वेदक अधिकारकी 'जो जं संकामेदि य' (गाथाङ्क ६२) गाथाके द्वारा चारों प्रकारके बन्ध, चारों प्रकारके संक्रमण, चारों प्रकारके उदय, चारों प्रकारकी उदीरणा और चारों प्रकारके सत्त्वसम्बन्धी अल्पबहुत्वकी सूचना निश्चयतः उसके गाम्भीर्य और अनन्तार्थगर्भित्वकी साक्षी है । पृ०६४२। १ देखो पृ० ८८३, सू० १४३१। २ 'चत्तारि य पट्ठवए गाहा' गा० ७। ३ देखो ४ देखो पृ०६६१ । ५ देखो पृ०६६६ । ६ देखो पृ० ६८१ । ७ देखो पृ० ७३८ ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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