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________________ कसायपाहुडसुत्त - १. पेज्ज या प्रेय-अधिकार ७. चतुःस्थान-अधिकार २. दोस या द्वेष-अधिकार ८. व्यंजन-अधिकार ३. विभक्ति-अधिकार ( जिसमें कि प्रकृति, ६, दर्शनमोहोपशामना-अधिकार स्थिति, अनुभाग और प्रदेशविभक्ति, | १०. दर्शनमोह-क्षपणा-अधिकार तथा क्षीणाक्षीण और स्थित्यन्तिक भी ११. संयमासंयम-अधिकार सम्मिलित हैं) १२. संयम-अधिकार ४. बन्धक-अधिकार १३. चारित्रमोहोपशामना-अधिकार ५. वेदक-अधिकार १४. चारित्रमोहक्षपणा-अधिकार ६. उपयोग-अधिकार १५. अद्धापरिमाण निर्देश किन्तु चूर्णिकारको जिस प्रकारसे विपयका प्रतिपादन करना अभीष्ट था, उसी प्रकारसे उन्होंने अधिकारोंका विभाजन किया है, ऐसा चूर्णिसूत्रोंके अध्ययनसे ज्ञात होता है। ४ गाथाओंका विभाजन-उपर्युक्त १५ अधिकारोंमें १८० गाथाओंका विभाजन इस प्रकारसे किया गया है प्रारम्भके ५ अधिकारोंमें ३, वेदकमें ४, उपयोगमें ७, चतुःस्थानमें १६, व्यजनमें ५, दर्शनमोहोपशमनामें १५, दर्शनमोहक्षपणामें ५, सयमासंयम और संयम अधिकारमें १, चारित्रमोहोपशामनामे ८ और चारित्रमोहक्षपणामें ११४ गाथाए निबद्ध हैं। इन सबका योग (३+४+ ७+१६+५+ १५+५+१++११४ = १७८ ) एकसौ अठहत्तर होता है । इनमें अधिकारोंका निर्देश करनेवाली प्रारंभकी २ गाथाओंको मिला देने पर कसायपाहुडकी सर्व-गाथाओंका योग १८० हो जाता है । यदि ऊपर वतलाई गई ५३ गाथाओंको भी गुणधर-रचित माना जाय, तो सर्व गाथाओंका योग (१८०+५३=२३३) दो सौ तेतीस होता है। ५ गाथाओका वर्गीकरण-चूर्णिसूत्रोके अनुसार कसायपाहुडकी मूल १८० गाथाओंका तीन प्रकारसे वर्गीकरण किया जा सकता है-१ सूचनासूत्रात्मक, २ पृच्छासूत्रात्मक और ३ व्याकरणसूत्रात्मक । १. सूचनासूत्रात्मक-गाथाएं-जिन गाथाओंके द्वारा प्रतिपाद्य विषयकी सूचनामात्र की गई है, किन्तु उसका कुछ भी वर्णन नहीं किया गया है, उन्हे सूचनासूत्रात्मक गाथाएं जानना चाहिए। ऐसी गाथाओंको चूर्णिकारने 'ऐसा गाहा सूचणासु' कहकर स्पष्टरूपसे सूचनासूत्र कहा है । वर्गीकरणकी दृष्टि से मूल-गाथाङ्क ४, ५, १४, ६२, ७०, ११५, १७६ और १८० को सूचनासूत्र जानना चाहिए। २. पृच्छासूत्रात्मक गाथाएं-जिन गाथाओंके द्वारा प्रतिपाद्य विषयके विवेचन करनेके लिए प्रश्न उठाये गये हैं, उन्हे चूर्णिकारने पृच्छासूत्र कहा है। चारित्रमोहक्षपणानामक पन्द्रहवे अधिकारकी प्रायः सभी मूल-गाथाए पृच्छासूत्रात्मक है। शेप अधिकाराम भी इस प्रकारके गाथासूत्र हैं, मूलगाथाओं में उनका विवरण इस प्रकार है-३, ६ से १३, १५-१६, २१, २८. ३१, ३० से ४१, ६३से ६७, ७१, ७७, ८६,६४,६८, १०२, १०४, १०६, ११३, ११६, १२६, १३३, १३८, १४१, १४६, १५१, १५४, १६०, १६१, १६३, १६५ से १६ और १७६ ।। ३. व्याकरणसूत्रात्मक गाथाएं-जिन गाथाओंमें पृच्छासूत्रोंके द्वारा उठाए गये प्रश्नोंका उत्तर दिया गया है, अथवा प्रतिपाद्य विपयका प्रतिपादन या अव्याख्यात अर्थका छ देखो पृ० ५८५, नू० २२६ ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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