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________________ २६० कसाय पाहुड सुत्त [५ संक्रम-अर्थाधिकार संकामया असंखेज्जगुणा । ११४. सम्मामिच्छत्तस्स संकामया विसेसाहिया । ११५. अणंताणुबंधीणं संकामया अणंतगुणा । ११६. सेसाणं कम्माणं संकामया तुल्ला विसेसाहिया । ११७. मणुसगईए सव्वत्थोवा मिच्छत्तस्स संकामया । ११८. सम्मत्तस्स संकामया असंखेज्जगुणा । ११९. सम्मामिच्छत्तस्स संकामया विसेसाहिया। १२०. अणंताणुबंधीणं संकामया असंखेजगुणा। १२१. सेसाणं कम्माणं संकामया ओघो। १२२. एइंदिएसु सव्वत्थोवा सम्मत्तस्स संकामया । १२३. सम्मामिच्छत्तस्स संकामया विसेसाहिया । १२४. सेसाणं कम्माणं संकामया तुल्ला अणंतगुणा । १२५. एत्तो पयडिट्ठाणसंकमो। १२६. तत्थ पुव्वं गमणिज्जा सुत्तसमुक्कित्तणा । १२७. तं जहा । अट्ठावीस वउवीस सत्तरस सोलसेव पण्णरसा । एदे खलु मोत्तणं सेसाणं संकमो होई ॥२७॥ संक्रामकोसे मिथ्यात्वके संक्रामक असंख्यातगुणित हैं । मिथ्यात्वके संक्रामकोसे सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेष अधिक हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामकोसे अनन्तानुबन्धीकपायोके संक्रामक अनन्तगुणित है। अनन्तानुवन्धीकषायोके संक्रामकोसे शेप मोहकर्मकी प्रकृतियोके संक्रामक परस्पर तुल्य और विशेष अधिक हैं ॥११२-११६।। चूर्णिसू०-मनुष्यगतिमे मिथ्यात्वके संक्रामक्र सबसे कम है। मिथ्यात्वके संक्रामकोंसे सम्यक्त्वप्रकृतिके संक्रामक असंख्यातगुणित है। सम्यक्त्वप्रकृतिके संक्रामकोसे सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेप अधिक हैं। सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामकोसे अनन्तानुवन्धीकपायोके संक्रामक असंख्यातगुणित हैं । शेप कर्मोंके संक्रामकोका अल्पबहुत्व ओघके समान है ।।११७-१२१॥ चूर्णिसू०-एकेन्द्रियोंमें सम्यक्त्वप्रकृतिके संक्रामक सबसे कम हैं। सम्यक्त्वप्रकृतिके संक्रामकोसे सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामक विशेप अधिक है । सम्यग्मिथ्यात्वके संक्रामकोसे शेप कर्मों के संक्रामक परस्पर तुल्य और अनन्तगुणित है ।।१२२-१२४।। इस प्रकार एकैकप्रकृतिसंक्रम समाप्त हुआ । चूर्णिसू०-अव इससे आगे प्रकृतिस्थानसंक्रमको कहेगे । उसमे सबसे पहले गाथासूत्रोकी समुत्कीर्तना करना चाहिए । वह इस प्रकार है ॥१२५-१२७॥ अट्ठाईस, चौवीस, सत्तरह, सोलह और पन्द्रह प्रकृतिक स्थान नियमसे संक्रमके अयोग्य हैं, अतएव इन पॉचों असंक्रम-स्थानोंको छोड़कर शेष तेईस स्थानोंका संक्रम होता है ॥२७॥ १ अह-चउरहियवीस सत्तरस सोलस च पन्नरस | वज्जिय संकमठाणाइ होति तेवीसइ मोहे ॥ १० ॥ कम्मप० स०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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