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________________ રકર कसाय पाहुड सुत्त [७ स्थितिक-भधिकार तस्स उकस्सयमुदयट्टिदिपत्तयं । ६५. एवं णवंसयवेदस्स । ६६. णवरि णवंसयवेदोदयस्सेत्ति माणिदव्याणि । ६७. जहण्णयाणि द्विदिपत्तयाणि कायवाणि । ६८. सन्चकम्माणं पि अग्गद्विदिपत्तयं जहण्णयमेओ पदेसो, तं पुण अण्णदरस्स होज्ज । ६९. मिच्छत्तस्स णिसेयद्विदिपत्तयमुदयहिदिपत्तयं च जहण्णयं कस्त। ७०. उवसमसम्मत्तपच्छायदस्स पडमसमयमिच्छाइटिस्स तप्पाओग्गुक्कस्ससंकिलिङ्कस्स तस्स जहण्णयं णिसेयद्विदिपत्तयखुदयहिदिपत्तयं च । ७१. मिच्छत्तस्स जहण्णयमधाणिसेयढिदिपत्तयं कस्स ? ७२. जो एई दियट्ठिदिसंतकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो अंतोमुहुत्तेण सम्मत्तं पडिवण्णो, वे छावहिसागरोवमाणि सम्मत्तमणुपालियूण मिच्छत्तं गदो । तप्पाओग्ग-उक्कस्सिया मिच्छत्तस्स जावदिया आचाहा तावदिमसमयमिच्छाइडिस्स तस्स जहण्णयमधाणिसेयहिदिपत्तयं । चूर्णिसू०-इसी प्रकार नपुंसकवेदके उत्कृष्ट स्थितिप्राप्त प्रदेशाग्रीका स्वामित्व जानना चाहिए । विशेषता केवल यह है कि नपुंसकवेदके उदयवाले जीवके ही उनका स्वामित्व कहना चाहिए ॥६५-६६॥ चूर्णिसू०- अव इससे आगे जघन्य स्थिति-प्राप्त प्रदेशाग्रोकी प्ररूपणा करना चाहिए। मिथ्यात्व आदि सभी कर्मोंका जघन्य अग्रस्थितिको प्राप्त एक कर्म-प्रदेश होता है । और वह किसी भी एक जीवके हो सकता है ॥६७-६८॥ शंका-मिथ्यात्वका जघन्य निपेकस्थिति-प्राप्त और जघन्य उदयस्थिति-प्राप्त प्रदेशाग्र किसके होता है ? ॥६९॥ समाधान-उपशमसम्यक्त्वसे पीछे आये हुये और तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट संक्लेशसे युक्त ऐसे प्रथम-समयवर्ती मिथ्याष्टिके मिथ्यात्वका जघन्य निपेकस्थितिप्राप्त और जघन्य उदयस्थितिप्राप्त प्रदेशाग्र होता है ॥७॥ शंका-मिथ्यात्वका जघन्य यथानिपेकस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ? ॥७१॥ समाधान-जो जीव जघन्य एकेन्द्रियस्थितिसत्कर्मके साथ सोमे उत्पन्न हुआ और अन्तर्मुहूर्तसे सम्यक्त्वको प्राप्त किया। पुनः दो वार छयासठ सागरोपम काल तक सम्यक्त्वका परिपालनकर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ। उसके योग्य मिथ्यात्वकी जितनी उत्कृष्ट आवाधा है, उतने समय तक मिथ्याष्टि रहनेवाले उस जीवके मिथ्यात्वका जघन्य यथानिपेकस्थितिको प्राप्त प्रदेशाग्र होता है ॥७२॥ विशेपार्थ-यहॉपर जो 'सोमे उत्पन्न हुआ और अन्तर्मुहूर्तसे सम्यक्त्वको प्राप्त किया' ऐसा कहा है, उसका अभिप्राय यह है कि वह एकेन्द्रियोसे आकर जघन्य आयुवाले असंही पंचेन्द्रिय पर्याप्तकोमे उत्पन्न होकर अतिलघु अन्तर्मुहूर्त के द्वारा पर्याप्तियोको पूर्णकर पर्याप्तक हुआ और तत्काल ही देवायुका बन्ध करके मरणको प्राप्त हो देनीमे स्त्पन्न हुआ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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