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________________ રરરૂ गा० २२ ] क्षीण-अक्षीणस्थितिक-अल्पवहुत्व-निरूपण १३९. अहवा इत्थि-णवूसयवेदाणं जहण्णयाणि ओकड्डणादीणि तिणि वि झीणहिदियाणि तुल्लाणि थोवाणि । १४०. उदयादो जहण्णयं झीणहिदियमसंखेजगुणं । १४१. अरइ-सोगाणं जहण्णयाणि तिणि वि झीणहिदियाणि तुल्लाणि थोवाणि । १४२. जहण्णयमुदयादो झीणहिदियं विसेसाहियं । अत्यन्त अभाव है, उन कर्म-परमाणुओकी परिणामविशेपके द्वारा उदीरणा करके जो उनका वेदन होता है, उसे उदीरणोदय कहते है। चूर्णिसू०-अथवा स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके अपकर्पणादि तीनो ही जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र परस्पर तुल्य और अल्प है। उन्हीका उदयकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र असंख्यातगुणित है। अरति और शोकके तीनो ही जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र परस्पर तुल्य और अल्प है। उन्हीके उदयकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र विशेप अधिक हैं ॥१३९-१४२॥ विशेपार्थ-इस क्षीणाक्षीण-प्रदेशसम्बन्धी अल्पबहुत्लके अन्तमें जयधवलाकारने सर्व अधिकारोमे साधारणरूपसे उपयुक्त एक अल्पबहुत्वदंडक भी मध्यदीपकरूपसे लिखा है, जो इस प्रकार हैं:-सर्वसंक्रसभागहार सबसे कम है। इससे गुणसंक्रमणभागहार असंख्यातगुणा है । गुणसंक्रमणभागहारसे उत्कर्षणापकर्पणभागहार असंख्यातगुणा है । उत्कर्पणापकर्पणभागहारसे अधःप्रवृत्तभागहार असंख्यातगुणा है । अधःप्रवृत्तभागहारसे योगगुणाकार असंख्यातगुणा है। योगगुणाकारसे कर्मस्थिति-सम्बन्धी नानागुणहानिशलाकाएँ असंख्यातगुणी है। कर्मस्थिति-सम्बन्धी नानागुणहानिशलाकाओसे पल्योपमके अर्धच्छेद विशेप अधिक है । पल्योपमके अर्धच्छेदोसे पल्योपमका प्रथम वर्गमूल असंख्यातगुणा है । पल्योपमके प्रथम वर्गमूलसे एकप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर असंख्यातगुणा है। एक प्रदेशगुणहानिस्थानान्तरसे द्वयर्धगुणहानिस्थानान्तर विशेप अधिक है। द्वयर्धगुणहानिस्थानान्तरसे निपेकभागहार विशेप अधिक है। निपेकभागहारसे अन्योन्याभ्यस्तराशि असंख्यातगुणी है। अन्योन्याभ्यस्तराशिसे पल्योपम असंख्यातगुणा है। पल्यापमस विव्यातसंक्रमणभागहार असंख्यातगुणा है । विध्यातसंक्रमणभागहारसे उद्वेलनभागहार असंख्यातगुणा १ सपहि एत्युद्देसे सव्वेसि अत्याहियाराण साहारणभूदमप्पाबहुगादडय मध्झटीवयभावेण पाचइस्सामो । स जहा-सव्वत्थोवो सबसमभागहारो । गुणसमभागदारो असोजगुणो । ओक्ट म्हणभागहारो असपेजगुणो । अधापवत्तभागहारो असखेनगुणो । जोगगुणगारो असम्वगुणो । याटिविणाणागुणहाणिसलागाओ असखेजगुणाओ। पलिदोवमरस छेदणया विरोसारिया । पल्दिोवमपटमवगमूल अराखेजगुण । एगपदेसगुणहाणिट्टाणंतरमसरोडगुण | दिवगुणहाणिहाणंतर विनेसादिक । लिमयभागदारो विसेसोहिओ । अण्णोणभत्थरासी यसरजगुणो । पल्दिोवममनसेनगुण । विजादनगमागदारी अससेजगुणो । उव्योष्णभागहारो अल्सेन्गुणो । अणुभागवन्मणाणं गाणापटेमगुपाणिग्लागायो अपत. गुणाओ। एगपटेसगुणहाणिटाणंतरमणतगुणं । दिवटगुणहामिाणतर विरेसाहि । गिसेपमागदागे निमेसाहिओ। अप्णोष्णन्मस्थरासो गणतगुणोति । जयध० ३०
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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