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________________ २३२ कसाय पाहुड सुत्त [६ क्षीणाक्षीणाधिकार याणि तिण्णि वितुल्लाणि असंखेजगुणाणि । १२८. एवं सम्मामिच्छत्त-पण्णारसकसायछण्णोकसायाणं । १२९. सम्मत्तस्स सव्यत्थोवमुक्कस्सयमुदयादो झीणहिदियं । १३०. सेसाणि तिणि विहीणहिदियाणि उकस्सयाणि तुल्लाणि विसेसाहियाणि । २३१. एवं लोभसंजलण-तिणि वेदाणं। १३२, एत्तो जहणणयं झीणढिदियं । १३३ मिच्छत्तस्स सन्चथोवं जहण्णयमुदयादो झीणहिदियं । १३४. सेसाणि तिणि वि झीणहिदियाणि तुल्लाणि असंखेजगुणाणि । १३५. जहा मिच्छत्तस्स जहण्णयमप्पाबहुअंतहा जेसिं कम्मंसाणमुदीरणोदओ अत्थि तेसि पि जहण्णयमप्पाबहुअं। अणंताणुवंधि इत्थि-णसयवेद-अरइ-सोगा त्ति एदे अट्ठकमसे मोत्तूण सेसाणमुदीरणोदयो । १३६. जेसि ण उदीरणोदयो तेसिं पि सो चेव आलायो अप्पाबहुअस्स जहण्णयस्स । १३७, णवरि अरइ-सोगाणं जहण्णयमुदयादो झीणहिदियं थोवं । १३८. सेसाणि तिणि वि झीणद्विदियाणि तुल्लाणि विसेसाहियाणि । असंख्यातगुणित है। इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व, संज्वलनलोभको छोड़कर पन्द्रह कषाय और हास्यादि छह नोकपायोका अल्पवहुत्व जानना चाहिए ।। १२५-१२८॥ चूर्णिसू०-सम्यक्त्वप्रकृतिका उदयकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र सबसे कम है । शेप तीनो ही उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र परस्पर तुल्य और उपर्युक्त पदसे विशेष अधिक है। इसी प्रकार संज्वलनलोस और तीनो वदोके अपकर्पणादि चारो पदोका अल्पवहुत्व जानना चाहिए ॥१२९-१३ १॥ चूर्णिसू०-अब इससे आगे जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र-सम्बन्धी अल्पवहुत्वको कहेगे :-मिथ्यात्वका उदयकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाम सबसे कम है। शेष तीनो ही क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र परस्पर तुल्य और उदयकी अपेक्षा असंख्यातगुणित है। जिस प्रकार मिथ्यात्वका जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्रसम्बन्धी अल्पबहुत्व कहा है, उसी प्रकारसे जिन कर्माशोका उदीरणोदय है, उनका भी जघन्य क्षीणस्थितिक-प्रदेशाग्र-सम्बन्धी अल्पवहुत्व जानना चाहिए । अनन्तानुवन्धीकपायचतुष्क, स्त्रीवेद, नपुंसकवंद, अरति और शोक इन आठ कर्मप्रकृतियोको छोड़कर शेष मोह-प्रकृतियोंका उदीरणोदय होता है। जिन प्रकृतियोका उदीरणादय नहीं होता है, उनके जघन्य अल्पवहुत्वका मी वही उपयुक्त आलाप ( कथन ) करना चाहिए । केवल इतनी विशेपता है कि अरति और शोकका उदयकी अपेक्षा जयन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र परस्पर तुल्य ओर उद्य-सम्बन्धी क्षीणस्थितिकप्रदेशाप्रसे विशेष अधिक है। ॥१३२-१३८॥ विशेपार्थ-जिन कर्म-परमाणुओका उदयावलीके भीतर अन्तरकरणके निमित्तमे १ उदीरणाए चेव उदयो उदीरणोदओ त्ति, जेसि कम्मसाणमुदयावलियम्भतरे अंतरकरणेण अञ्चतमसंताणं कम्मपरमाणं परिणामविसेसेणागखेजलोगपटिभागेणोदीरिदाणमणुएवो तेगिमुटीरणोदओ नि एसो एत्य गावत्यो अवध
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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