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________________ २३१ गा० २२] क्षीण-अक्षीणस्थितिक-अल्पबहुत्व-निरूपण मुदयावलियं पविटा, ताधे अरदि-सोगाणं जहण्णयं तिण्हं पि झीणहिदियं । १२२. अरइ-सोगाणं जहण्णयमुदयादो झीणहिदियं कस्स ? १२३. एई दियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो । तत्थ संजमासंजमं संजमं च बहुसो गदो । चत्तारि वारे कसायमुवसामिदा । तदो एइदिए गदो । तत्थ पलिदोयमस्स असंखेजदिभागमच्छिदो जाव उवसामयसमयपवद्धा णिग्गलिदा त्ति । तदो मणुस्सेसु आगदो। तत्थ पुचकोडी देसूणं संजममणुपालियूण अपडिवदिदेण सम्मत्तेण वेमाणिएसु देवेसु उपवण्णो । अंतोमु हुत्त मुववण्णो उकस्ससंकिलेसं गदो, अंतोमु हुत्तमुक्कस्सद्विदि बंधियूण पडिभग्गो जादो । तस्स आवलियपडिभग्गस्स भय-दुगुंछाणं वेदयमाणस्स अरदि-सोगाणं जहण्णयमुदयादो झीणट्ठिदियं । _ १२४. एवमोघेण सव्वमोहणीयपयडीणं जहण्णमोकडणादिझीणहिदियसामित्तं परूविदं। १२५. अप्पाबहुअं । १२६. सव्वत्थोवं मिच्छत्तस्स उक्कस्सयमुदयादो झीणद्विदियं । १२७. उक्कस्सयाणि ओकड्डणादो उक्कड्डणादो संकमणादो च झीणद्विदिअपकर्षणकर उदयावलीके वाहिर निक्षेपण किया। तदनन्तर समयमे उस हिसमयवर्ती देवके अरत्ति-शोककी एक स्थिति उदयावलीमे प्रविष्ट हुई। उस समय उस देवके अरति-शोकका अपकर्पणादि तीनकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ।। १२१।।। शंका-अरति-शोकका उदयकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ? ।।१२२॥ समाधान-जो जीव जघन्य एकेन्द्रियसत्कर्मके साथ सोमे आया और वहॉपर संयमासंयम तथा संयमको बहुत वार प्राप्त हुआ। चार वार कपायोका उपशमन किया । तदनन्तर एकेन्द्रियोमे चला गया। वहॉपर पल्योपमके असंख्यातवे भागकाल तक रहा, जबतक कि उपशामक समयप्रबद्ध पूर्णरूपसे गल जाते हैं। तदनन्तर वह मनुष्योमे आया । वहॉपर देशोन पूर्वकोटी तक संयमका परिपालनकर अप्रतिपतित सम्यक्त्वके साथ ही वैमानिक देवोमे उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होनेके अन्तर्मुहूर्त पश्चात्, अर्थात् पर्याप्तक होनेपर उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त हुआ और अन्तर्मुहूर्त तक अरति-शोककी उत्कृष्ट स्थितिको बाँधकर संक्लेशसे प्रतिनिवृत्त हुआ । उस आवलिक-प्रतिभन्नके अर्थात् जिसे संक्लेगसे प्रतिनिवृत्त हुए एक आवलीकाल व्यतीत हो गया है और जो भय तथा जुगुप्साका वंदन कर रहा है, ऐसे उस जीवके अरति और शोकका उदयकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ।।१२३।। चूर्णिसू०-इस प्रकार मोहनीयकर्मी सर्व प्रकृतियोंके अपकर्पणादि-सम्बन्धी जघन्य श्रीणस्थितिक प्रदेशामके स्वामित्वका निरूपण किया गया ।।१२४॥ अब क्षीण-अक्षीणस्थितिक प्रदेशाग्रोका अल्पवहत्व कहते है-मिथ्यात्वका उदयकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशात सबसे कम है। अपकर्षण, उत्कर्षण और संतामणी अपेक्षा मिगायकं उत्कष्ट क्षीणन्धितिक प्रदेशाग्र नीनो परम्पर तुन्य होते हुए भी उपयुत्त पदम
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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