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________________ २३० कसाय पाहुड सुत्त [ ६ क्षीणाक्षीणाधिकार सय वेदस्स पुञ्चपरुविदो जाधे अपच्छिममणुस्सभवरगहणं पुञ्चकोडी देखणं संजयमणुपालिदूण अंतो मुहुत्त सेसे मिच्छत्तं गओ । तदो वेमाणियदेवीसु उववण्णो, अंतोमुहुत्तद्धमुववण्णो उकस्ससंकिलेसं गदो । तदो विकडिदाओ द्विदीओ उकडिदा कम्मंसा जाधे तदो अंतमुत्तमुक्कसइत्थिवेदस्स डिदि बंधियूण पडिभग्गो जादो, आवलियपडिभगाए तिस्से देवीए इत्थिवेदस्स उदयादो जहण्णयं झीणडिदियं । १२०. अरदि - सोगाण मोकडणादितिगझीणडिदियं जहण्णयं कस्स १ १२१. एइ दियकम्मेण जहण्णएण तसेसु आगदो, संजमासंजमं संजमं च बहुसो लद्घृण तिष्णि वारे कसा उवसामेयूण एवं दिए गदो । तत्थ पलिदोवमस्स असंखेजदिभागमच्छियूण जाव उवसामयसमयपवद्धा गलंति तदो मणुस्सेसु आगदो । तत्थ पुव्यकोडी देणं संजम पालियूण कसा उवसामेण उवसंतकसाओ कालगदो देवो तेत्तीससागरोचमिओ जादो | ताधे चेय हस -रईओ ओकडिदाओ उदद्यादिणिक्खित्ताओ अरदि-सोगा ओकड्डित्ता उदयावलियवाहिरे णिक्खित्ता, से काले दुसमयदेवस्स एया ट्ठिदी अरह - सोगाण समाधान- इसी नपुंसक वेद की प्ररूपणामे पूर्व प्ररूपित जीवने जिस समय अपश्चिम मनुष्य भवको ग्रहण किया और देशोन पूर्वकोटीकाल तक संयमका परिपालनकर जीवन के अन्तर्मुहूर्तं शेप रह जानेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ और मरणकर विमानवासी देवियो में उत्पन्न हुआ | उत्पन्न होनेके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् ही, अर्थात् पर्याप्त होकर उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त हुआ । उस संक्लेश से जब सर्व कर्मों के अन्तःकोड़ाकोड़ीप्रमाण स्थितिबन्धसे भी दूर तककी स्थितियोंको बढ़ाया और उनके कर्मप्रदेशोका भी उत्कर्पण किया, तब उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त काल तक स्त्रीवेदी पन्द्रह कोडाकोडी सागरोपमप्रमाण उत्कृष्ट स्थितिको वध करके . संक्लेशसे प्रतिभग्न अर्थात् प्रतिनिवृत्त हुआ । संक्लेशसे प्रतिनिवृत्त होने के एक आवलीकाल बीतने पर उस देवी स्त्रीवेदका उदयकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ।। ११९ ॥ शंका- अरति और शोकप्रकृतिका अपकर्षणादि तीनकी अपेक्षा जघन्य क्षीण - स्थितिक प्रदेश किसके होता है ? ॥ १२०॥ समाधान - जो जीव जघन्य एकेन्द्रियकर्मसे अर्थात् अभव्यसिद्धोके योग्य जघन्य सत्कर्मके साथ एकेन्द्रियोसे आकर त्रस जीवोमे उत्पन्न हुआ । वहॉपर संयमासंयम और संयमको बहुत वार प्राप्तकर तथा तीन वार कपायोका उपशमनकर पुनः एकेन्द्रियो में उत्पन्न हुआ । वहाँपर पल्योपमके असंख्यातवे भागप्रमाणकाल तक रहा, जबतक कि उपशामक समयप्रबद्ध गलते हैं । उसके पश्चात् मनुष्यो मे आया । वहॉपर देशोन पूर्वकोटीकाल तक संयमका परिपालनकर और कपायोका उपशमन करके उपशान्तकपायवीतरागच्छद्मस्थ होकर और मरणको करके तेतीस सागरोपमकी स्थितिका धारक अहमिन्द्रदेव हुआ । उस ही समय हास्य और रति प्रकृतियोका अपकर्षणकर उदद्यावलीमे निक्षिप्त किया और अरति शोकका ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'तत्य' पद नहीं है । ( देखो पृ० ९१५ ) । 1
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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