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________________ २३४ कसाय पाहुड सुत्त एवमप्पाचहुए समत्ते झीणमझीणं ति पदं समत्तं होदि । झणझणाहियारो समत्तो । [ ६ क्षीणाक्षीणाधिकार है । उद्वेलनभागहारसे अनुभागवर्गणाओकी नानाप्रदेशगुणहानिशलाकाऍ अनन्तगुणी है । इनसे इन्हींका एक प्रदेशगुणहानिस्थानान्तर अनन्तगुणा है। उससे अनुभागवर्गणाओं का यर्धगुणहानिस्थानान्तर विशेष अधिक है । उससे अनुभागवर्गणाओका निपेकभागहार विशेष अधिक है | अनुभागवर्गणाओके निपेकभागहारसे उनकी अन्योन्याभ्यस्तराशि अनन्तगुणी है । इस प्रकार अल्पबहुत्वके समाप्त होनेपर चौथी मूलगाथाके 'झीणमझीर्ण' इस पदकी विभापा समाप्त हुई । इस प्रकार क्षणाक्षणाधिकार समाप्त हुआ ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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