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________________ गा० २२] क्षीण-अक्षीणस्थितिक-स्वामित्व-निरूपण २२७ मणादो च झीणहिदियं । १०४, तस्सेव आवलियवेदयसम्माइटिस्स जहण्णयमुदयादो झीणद्विदियं । १०५. एवं सम्मामिच्छत्तस्स । १०६. णवरि पढमसमयसम्मामिच्छाइद्विस्स आवलियसम्मामिच्छाइद्विरस चेदि । १०७. अट्टकसाय-चउसंजलण-पुरिसवेद-हस्सरदि-भय-दुगुंछाणं जहण्णययोकड्डणादो उक्कड्डणादो संकमणादो च झीणढिदियं कस्स ? १०८. उवसंतकसाओ मदो देवो जादो तस्स पढमसमयदेवस्स जहण्णयमोकड्डणादो संकमणादो च झीणद्विदियं । १०९, तस्सेव आवलियउववण्णस्त जहण्णयमुदयादो झीणद्विदियं । ११०. अणंताणुवंधीणं जहण्णयमोकड्डणादो उक्कड्डणादो संकमणादो च झीणहिदियं कस्स १ १११. सुहमणिओएसु कन्महिदिमणुपालियूण संजमासंजमं संजमंच कर्षणसे, उत्कर्पणसे और संक्रमणसे सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है । जिसे एक आवलीकाल वेदकसम्यक्त्वको धारण किये हुए हो गया है, ऐसे उसी वेदकसम्यग्दृष्टि जीवके उदयकी अपेक्षा सम्यक्त्वप्रकृतिका जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ॥१०३-१०४॥ चूर्णिसू०-इसी प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिके अपकर्पणादि चारोकी अपेक्षासे क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्रका जघन्य स्वामित्व जानना चाहिए। केवल इतनी विशेपता है कि प्रथमसमयवर्ती सम्यग्मिध्यादृष्टिके अपकर्पणादि तीनकी अपेक्षा जघन्य स्वामित्व होता है, और एक आवली विता देनेवाले सम्यन्मिथ्याष्टिके उदयकी अपेक्षा जघन्य स्वामित्व होता है ॥१०५-१०६॥ शंका-आठ मध्यमकपाय, चार संज्वलन, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय और जुगुप्साका अपकर्षण, उत्कर्पण और संक्रमणकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ॥१०॥ समाधान-जो उपशान्तकपाय-वीतरागछद्मस्थ संयत मरकर देव हुआ, उस प्रथमसमयवर्ती देवके अपकर्पण, उत्कर्पण और संक्रमणकी अपेक्षा उपर्युक्त प्रकृतियोका जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है। उसी देवके जब उत्पन्न होनेके अनन्तर एक आवलीकाल बीत जाता है, तब उसके उदयकी अपेक्षा उन्ही प्रकृतियोके भीणस्थितिक प्रदेशाप्रका जघन्य स्वामित्व होता है ।। १०८-१०९।। शंका-अनन्तानुबन्धीकपायोंका अपकर्पण, उत्कर्पण और संक्रमणकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ? ॥११०॥ समाधान-जिसने सूक्ष्मनिगादिया जीवामे कर्मस्थितिकाल-प्रमाण रहकर और ताम्नपनवाली प्रतिमें एम सूत्रको टोकामें सम्मिलित कर दिया है। पर इसके सनलको पुष्टि सादपनीय प्रतिसे हुई है । (देखो पृ० ९०५ पंन्नि ७)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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