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________________ २२६ कसाय पाहुड सुत्त [६ क्षीणाक्षीणाधिकार समय अपुचकरणे वट्टमाणयस्स । ६६. णवरि हस्स-रइ-अरइ-सोगाणं जइ कीरइ, भयदुगुंछाणमवेदगो कायव्यो। जइ भयस्स, तदो दुगुंछाए अवेदगो कायव्यो । अह दुगुछाए, तदो भयस्त अवेदगो कायव्यो । ९७. उक्कस्सयं सामित्तं समत्तमोघेण । ९८. एत्तो जहण्णयं सामित्तं वत्तइस्सामो । ९९. मिच्छत्तस्स जहण्णयमोकड्डणादो उक्कड्डणादो संकमणादो च झीणहिदियं कस्स ? १००. उवसामओ छसु आचलियासु सेसासु आसाणं गओ तस्स पढमसमयमिच्छाइटिस्स जहण्णयमोकड्डणादो उक्कड्डणादो संकमणादो च झीणहिदियं । १०१. उदयादो जहण्णयं झीणहिदियं तस्सेव आवलियमिच्छादिहिस्स? १०२. सम्मत्तस्स जहण्णयमोकड्डणादितिण्हं पि झीणहिदियं कस्स ? १०३. उवसमसम्मत्तपच्छायदस्स पढमसमयवेदयसम्माइद्विस्स ओकड्डणादो उक्कड्डणादो संकइतना भेद है कि यदि वह हास्य-रति और अरति-शोकका आपण कर रहा है, तो उस समय वह भय और जुगुप्साका अवेदक है। यदि भयका क्षपण कर रहा है, तो उस समय वह जुगुप्साका अवेदक है और यदि वह जुगुप्साका क्षपण कर रहा है, तो भयका अवेदक होता है । इस प्रकारसे उनके उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्रकी प्ररूपणा करना चाहिए ।।९५-९६।। चूर्णिसू०-इस प्रकार ओघकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्रके स्वामित्वका निरूपण समाप्त हुआ ॥९७॥ चूर्णिसू०-अब इससे आगे अपकर्पणादि चारोकी अपेक्षा क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्रके जघन्य स्वामित्वको कहेगे ॥९८॥ शंका-मिथ्यात्वका अपकर्पण, उत्कर्पण और संक्रमणकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ॥९९॥ समाधान-जो दर्शनमोहनीयकर्मका उपशमन करनेवाला उपशमसम्यग्दृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्वके कालमे छह आवलियोके शेप रहनेपर सासादन गुणस्थानको प्राप्त हुआ, ( और वहॉपर अनन्तानुबन्धीकपायके तीन उदयसे प्रतिसमय अनन्तगुणित संक्लेशकी वृद्धिके साथ सासादनगुणस्थानका काल समाप्त करके मिथ्यात्वगुणस्थानको प्राप्त हुआ, ) उस प्रथमसमयवर्ती मिथ्याष्टिके अपकर्पण, उत्कर्पण और संक्रमणकी अपेक्षा मिथ्यात्वका जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है। इसी उपयुक्त जीवके जव मिथ्यात्वगुणस्थानमें प्रवंश करनेके पश्चात् एक आवलीकाल बीत जाता है, तब उस आवलिक-मिथ्याष्टिके उदयकी अपेक्षा मिथ्यात्वका जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ॥१००-१०१॥ शंका-सम्यक्त्वप्रकृतिका अपकर्षणादि तीनोकी अपेक्षा जघन्य क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ? ॥१०२।। समाधान-उपशमसम्यक्त्वको पीछे किया है जिसने पंस, अर्थात्, उपशमसभ्यऋत्वके पश्चात बेटकसम्यक्त्वको ग्रहण करनेवाले में प्रश्रमसमयवर्ती वेदकसम्यग्दृष्टिकं अप
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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