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________________ गा० २२] क्षीण-अक्षीणस्थितिक-स्वामित्व-निरूपण गुणिदकम्मंसियस्स पुरिसवेदं खवेमाणयस्स आवलियचरिमसमय-असंछोहयरस तस्स उक्करसयं तिण्हं पि झीणहिदियं । ८८. उकस्सयमुदयादो झीणहिदियं चरिमसमयपुरिसवेदयस्स । ८९. णबुसयवेदयस्स उक्कस्सयं तिण्हं पि झीणहिदियं कस्स ? ९०. गुणिदकम्मंसियस्स णवंसयवेदेण उपट्टिदस्स खवयस्स णबुसयवेद-आवलियचरिमसमयअसंछोहयस्स तिणि वि झीणहिदियाणि उकस्सयाणि । ९१. उक्करसयमुदयादो झीणहिदियं तस्सेव। ९२. छण्णोकसायाणमुकस्सयाणि तिणि वि झीणहिदियाणि करस ? ९३. गुणिदकम्मंसिएण खवएण जाधे अंतरं कीरमाणं कदं, तेसिं चेव कम्मंसाणमुदयावलियाओ उदयवज्जाओ पुण्णाओ ताधे उक्कस्सयाणि तिणि वि झीणहिदियाणि ९४. तेसिं चेव उक्कस्सयमुदयादो झीणहिदियं कस्स ? ९५. गुणिदकम्मसियस्स खवयस्त चरिम समाधान-जो गुणितकर्माशिक जीव पुरुपवेदका क्ष्य करता हुआ आपलीके चरम समयमे असंक्षोभकमावसे अवस्थित है, उसके अपकर्षणादि तीनोकी अपेक्षा पुरुपवेदका उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है। किन्तु उदयकी अपेक्षा चरमसमयवर्ती पुरुपवेदी क्षपकके पुरुपवेदका उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ।।८७-८८॥ शंका-नपुंसकवेदका अपकर्पणादि तीनोकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ॥८९।। समाधान-जो गुणितकर्माशिक जीव नपुंसकवेदके उदयके साथ श्रेणीपर चढ़ा है और नपुंसकवेदको क्षय करते हुए आवलीके चरमसमयमे असंक्षोभकभावसे अवस्थित है, ऐसे क्षपकके अपकर्पणादि तीनोकी अपेक्षा नपुंसकवेदका उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है । उसी ही चरमसमयवर्ती नपुंसकवेदी क्षपकके उदयकी अपेक्षा नपुंसकवेदका उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ॥९०-९१।। शंका-हास्यादि छह नोकपायोका अपकर्पणादि तीनोकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र किसके होता है ।।९२।।। समाधान-गुणितकर्माशिकरूपसे आये हुए आपकने जिस समय छहा नोकपायोंके क्रियमाण अन्तरको कर दिया और उन्हीं कांशोकी उदय-समयको छोड़कर उदयावलियोको पूर्ण किया, उस समय हास्यादि छह नोकपायांका अपकर्पणादि तीनोकी अपेक्षा उत्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्र होता है ॥९३॥ शंका-उन्ही हास्यादि छह नोकपायोका उदयकी अपेक्षा उन्कृष्ट क्षीणस्थितिक प्रदेशान किसके होता है ? ॥९४॥ समाधान-गुणितकामिक और अपूर्वकरणो चरम समयमे बर्तमान अपकरें उदयकी अपेक्षा हाम्यादि छह नोकपायोंका उत्कृष्ट श्रीणन्धितिक प्रदेशगान होता है। संचा
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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