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________________ २१८ - कसाय पाहुड सुत्त . [ ६ क्षीणाक्षीणाधिकार अवत्थुरियप्पा तदो रूवुत्तरा संतकम्ममस्सियूण* । ३४. जद्देही एसा द्विदी तत्तियं हिदिसंतकम्मं कस्मद्विदीए सेसयं जस्स पदेसग्गस्स तं पदेसग्गदिस्से द्विदीए होज्ज । तं पुण उक्कड्ड णादो झीणहिदियं । ३५. एदादो द्विदीदो समयुत्तरहिदिसंतकम्मं कम्मद्विदीए सेसयं जस्स पदेसग्गस्स तमुक्कड्डणादो झीणहिदियं । ३६. एवं गंतूण आवाहामेत्तहिदिसंतकम्मं कम्महिदीए सेसं जस्स पदेसग्गस्त एदीए द्विदीए दीसइ तं पि उक्कड्डणादो झीणहि दियं । ३७. आवाहासमयुत्तरमेत्तं हिदिसंतकम्मं कम्महिदीए सेसं जस्स पदेसग्गस्स तं पि उक्कड्डणादो झीणहिदियं । ३८. आपाधा दुसमयुत्तरमेत्तद्विदिसंतकम्मं कम्मद्विदीए सेसं जस्स पदेसग्गस्स एदिस्से द्विदीए दिस्सइ तं पि पदेसग्गमुक्कड्डणादो झीणहिदियं । ३९. तेण परमुक्कड्डणादो अज्झीणहिदियं । ४०. दुसमयूणाए आवलियाए अणिया आवाहा एवदियाए द्विदीए वियप्पा समत्ता । ४१. एत्तो समयुत्तराए हिदीए वियप्पे भणिस्सायो । ४२. एत्तो पुण द्विदीदो विशेषार्थ-अनन्तर-प्ररूपित अधस्तनस्थितिके अवस्तु-विकल्पोसे इस विवक्षित स्थितिके विकल्पोको एक रूप अधिक कहनेका कारण यह है कि उससे एक समय आगे चलकर ही इस स्थितिका अवस्थान है। यह 'रूपोत्तर' पद अन्तदीपक है, इसलिए अधस्तनवर्ती समस्त स्थितियोके अवस्तु-विकल्प अनन्तर-अनन्तरवर्ती स्थितिसे एक एक रूप अधिक ग्रहण करना चाहिए । विकल्पोका यह कथन सत्कर्मकी अपेक्षा किया गया है, क्योकि, नवकवद्धकी अपेक्षा तो वहाँ पर आवली-प्रमाण अवन्तु-विकल्प अवस्थितस्वरूपसे पाये जाते है। चूर्णिसू०-जितनी यह स्थिति है, उतना स्थितिसत्कर्म जिस प्रदेशायका कर्मस्थितिमे शेष रहेगा, वह प्रदेशाग्र इस स्थितिमे पाया जा सकता है और वह उत्कर्पणसे क्षीणस्थितिक है । इस स्थितिसे एक समय-अधिक स्थितिसत्कर्म जिस प्रदेशाग्रका कर्मस्थितिमे शेप होगा, वह भी प्रदेशाग्र उत्कर्षणसे क्षीणस्थितिक है । इस प्रकार एक एक समय-वृद्धिके क्रमसे आगे जाकर इस स्थितिमे आवाधाप्रमाण स्थितिसत्कर्म जिस प्रदेशायका कर्मस्थितिमे शेष दिखाई देगा, वह भी उत्कर्पणसे क्षीणस्थितिक समझना चाहिए । एक समय अविक आवाधाप्रमाण स्थितिसत्कर्म जिस प्रदेशाग्रका कर्मस्थितिमे गेप होगा, वह भी उत्कर्पणसे क्षीणस्थितिक है। दो समय-अधिक आवाधाप्रमाण स्थितिसत्कर्म जिस प्रदेशाग्रका कर्मस्थितिमे शेपरूपसे इस स्थितिमे दिखाई देगा, वह प्रदेशाग्र भी उत्कर्षणसे क्षीणस्थितिक है। उससे परवर्ती कर्मप्रदेशाग्र उत्कर्पणसे अक्षीणस्थितिक है। इस प्रकार दो समय कम आवलीसे हीन आवाधावाली जो स्थिति है, उस स्थितिके विकल्प समाप्त हुए ॥३४-४०॥ चूर्णिसू०-अब इससे आगे अनन्तर-व्यतिक्रान्त स्थितिसे एक समय अधिक ताम्रपत्रवाली प्रतिमें 'संतकम्ममल्सियूण' इस सूत्राशको टीकाका अग बना दिया गया है. जय कि इसकी व्यारख्या टीका में स्पष्टलपमे की गई है। अतएव उसे सूत्राग ही गानना चाहिए। (देखो १० ८८६)
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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