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________________ गा० २२] क्षीण-अक्षीणस्थितिक-अर्थपद-निरूपण २१९ समयुत्तरा द्विदी कदमा ? ४३. जहणिया आवाहा तिसमयूणाए आवलियाए ऊणिया, एवदिमा द्विदी । ४४. एदिस्से हिदीए एत्तिया चेव वियप्पा । णवरि अवत्थुवियप्पा रूवुत्तरा। ४५ एस कमो जाव जहणिया आवाहा समयुत्तरा त्ति । ४६. जहणियाए आवाहाए दुसमयुत्तराए पहुडि णत्थि उक्कड्डणादो झीणहिदियं । ४७. एवमुक्कडणादो झीणहिदियस्स अट्ठपदं समत्तं । ४८. एत्तो संकमणादो झीणट्ठिदियं । ४९. जं उदयावलियपविट्ठ तं, णत्थि अण्णो वियप्पो । ५०. उदयादो झीणहिदियं ५१. जमुद्दिण्णं तं, णत्थि अण्णं । ५२. एत्तो एगेगझीणहिदियमुक्कस्सयमणुक्कस्सयं जहण्णयमजहणयं च । स्थितिके विकल्प कहेगे ॥४१॥ शंका-इस अनन्तर-व्यतिक्रान्त स्थितिसे एक समय-अधिक स्थिति कोनसी है ॥ ४२ ॥ समाधान-तीन समय-कम आवलीसे हीन जो जघन्य आवाधा है, वही यह स्थिति है । अर्थात् उदयस्थितिसे लेकर तीन समय-कम आवलीसे हीन जघन्य आवाधाप्रमाण ऊपर चलकर आवाधाके अन्तिम समयसे तीन समय कम आवलीप्रमाण नीचे उतर कर यह विवक्षित स्थिति अवस्थित है ॥४३॥ __ चूर्णिसू०-इस स्थितिके वस्तु-विकल्प इतने ही होते है । किन्तु अवस्तु-विकल्प एक रूपसे अधिक होते है । यह क्रम समयोत्तर जघन्य आवाधा तक जानना चाहिए। दो समय-अधिक जघन्य आवाधासे लेकर ऊपर उत्कर्षणसे प्रदेशाग्र क्षीणस्थितिक नहीं है । इस प्रकार उत्कर्पणसे क्षीणस्थितिक प्रदेशाग्रका अर्थपद समाप्त हुआ ॥४४-४७॥ चूर्णिसू ०-अब इससे आगे संक्रमणसे क्षीणस्थितिकको कहेंगे । जो कर्मप्रदेशाग्र उदयावलीमे प्रविष्ट है, वह संक्रमणसे क्षीणस्थितिक हैं, अर्थात् संक्रमणके अप्रायोग्य हैं । किन्तु जो प्रदेशाग्र उदयावलीके वाहिर स्थित है और जिनकी वन्धावली बीत चुकी है, वे संक्रमणसे अक्षीणस्थितिक हैं, अर्थात संक्रमण होनेके योग्य है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प यहाँ संभव नहीं है ॥४८-४९॥ चूर्णिसू ०-अब उदयसे क्षीणस्थितिकको कहेंगे । जो कर्मप्रदेशाग्र उदीर्ण है, अर्थात् उदयमे आकर और फलको देकर तत्काल गल रहा है, वह उदयसे क्षीणम्थितिक है । इसके अतिरिक्त अन्य समस्त स्थितियोंके प्रदेशाग्र उदयसे अक्षीणस्थितिक हैं, अर्थात् उन्हे उद्यके योग्य जानना चाहिए । यहॉपर और अन्य कोई विकल्प सभव नहीं है ॥५०-५१।। चूर्णिसू०-अब इसमे आगे एक-एक क्षीणस्थितिकके उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट. जघन्य और अजघन्य पदोकी प्ररपणा करना चाहिए ॥५२॥ विशेपार्थ-अभी ऊपर जो अपकर्पण, उत्कर्पण, संक्रमण और उदयकी अपेक्षा श्रीण स्थितिक-अक्षीणस्थितिकी प्ररूपणा की है, उसके विशेष निर्णयके लिए उत्कृष्ट , अनुष्ट.
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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