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________________ गा० २२] उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्ति अल्पवहुत्व-निरूपण २७८. पुरिसवेदे जहण्णपदेससंतकम्ममणंतगुणं । २७९. इत्थिवेद जहण्णपदससंतकम्मं संखेज्जगुणं । २८०. हस्से जहण्णपदेससंतकम्मं संखेज्जगुणं। २८१. रदीए जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २८२. सोगे जहण्णपदेससंतकम्मं संखेज्जगुणं । २८३. अरदीए जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २८४. णवंसयवेदे जहण्णपदेससंतकम्म विसेसाहियं । २८५. दुगुंछाए जहण्णपदेससंतकम्म विसेसाहियं । २८६. भए जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २८७. माणसंजलणे जहण्णपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । २८८. कोहसंजलणे जहण्णपदेससंतकम्म विसेसाहियं । २८९. मायासंजलणे जहण्णपदेससंतकम्पं विसेसाहियं । २९०. लोभसंजलणे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २९१. एत्तो भुजगारं पदणिक्खेव-बड्डीओ च कायबाओ। वरणलोभकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है ॥२७४-२७७॥ चूर्णिसू०-प्रत्याख्यानावरणलोभकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे पुरुपवेदमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म अनन्तगुणा है । पुरुपवेदके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे स्त्रीवेदमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म संख्यातगुणा है । स्त्रीवेदके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे हास्यप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म संख्यातगुणा है । हास्यप्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे रतिप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । रतिप्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे शोकप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म संख्यातगुणा है । शोकप्रकृतिके जवन्यप्रदेशसत्कर्मसे अरतिप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है। अरतिप्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे नपुंसकवेदमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है। नपुंसकवेदके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे जुगुप्साप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है। जुगुप्साप्रकृतिके जघन्यप्रदेशसत्कर्मसे भयप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है ॥२७८-२८६॥ चूर्णिसू०-भयप्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे संज्वलनमानमें जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है । संज्वलनमानके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे संज्वलनक्रोधमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है । संज्वलनक्रोधके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे संज्वलनमायामे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है । संज्वलनमायाके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे संज्वलनलोभमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है ॥२८७-२९०॥ चूर्णिसू०-अब इसमे आगे मुजाकार, पदनिक्षेप और वृद्धिकी प्ररूपणा करना चाहिए ॥ २९१ ॥ विशेपार्थ-भुजाकार-अनुयोगद्वारमे भुजाकार, अल्पतर और अवस्थितस्प प्रदेश. सत्कर्मका विचार किया गया है। जो जीव विवक्षित कर्मके अन्य प्रदेशसत्कर्ममे अधिक प्रदेशसत्कर्मको प्राप्त हो, वह भुजाकार-प्रदेशविभक्तिवाला है । जो जीव अधिक प्रदेगनकर्मसे अल्प-प्रदेशसत्कर्मको प्राप्त हो, वह अल्पतर-प्रदेशविभक्तिवाला है। जिम जीवके विवक्षिन ho the
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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