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________________ २१२ कसाय पाहुड सुत्त [५ प्रदेशविभक्ति २९२. जहा उक्कस्सयं पदेससंतकम्मं तहा संतकम्मट्ठाणाणि । __एवं पदेसविहत्ती समत्ता कर्मका प्रदेशसत्कर्म प्रथम समयके समान द्वितीय समयमें भी वना रहे, वह अवस्थित-प्रदेशविभक्तिवाला है । जिस जीवके विवक्षितकर्मका पहले प्रदेशसत्कर्म न होकर वर्तमान समयमे नवीन प्रदेशसत्कर्म हो, वह अवक्तव्य-प्रदेशविभक्तिवाला है। भुजाकार-प्रदेशविभक्तिमें इन सबका विस्तृत विवेचन समुत्कीर्तना, स्वामित्व आदि तेरह अनुयोगद्वारोसे किया गया है। पदनिक्षेप-अधिकारमे भुजाकार-प्रदेशसत्कर्मोंका ही उत्कृष्ट और जघन्य पदोके द्वारा वृद्धि-हानि और अवस्थानका विशेप वर्णन किया गया है । इस अधिकारमे यह बतलाया गया है कि कोई जीव यदि विवक्षित कर्मका प्रथम समयमे अमुक प्रदेशसत्कर्मवाला हो, तो अधिकसे अधिक उसके प्रदेशसत्कर्ममे कितनी वृद्धि हो सकती है और कमसे कम कितनी वृद्धि हो सकती है । इसी प्रकार यदि कोई जीव वर्तमान समयके प्रदेशसत्कर्मसे अनन्तरवर्ती द्वितीय समयमें अल्पप्रदेश सत्कर्मवाला हो, तो उसके सत्कर्ममे अधिकसे अधिक कितनी हानि हो सकती है और कमसे कम कितनी हानि हो सकती है । यदि समान प्रदेशसत्कर्म वना रहे, तो कितने समय तक बना रहेगा, इस सबका विचार इस अधिकारमे समुत्कीर्तना, स्वामित्व और अल्पवहुत्व इन तीन अनुयोगद्वारोसे किया गया है । वृद्धि अधिकारमे पदनिक्षेपका ही पड्गुणी वृद्धि और हानिके द्वारा प्रदेशसत्कर्म-सम्बन्धी विशेष विचार समुत्कीर्तनादि तेरह अनुयोगद्वारोसे किया गया है, सो विशेष जिज्ञासु जनोको जयधवला टीकाके अन्तर्गत उच्चारणावृत्तिसे जानना चाहिए । चूर्णिसू०-जिस प्रकार स्वामित्व आदि अनुयोगद्वारोसे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मका निरूपण किया गया है, उसी प्रकारसे प्रदेशसत्कर्मस्थानोकी भी प्ररूपणा करना चाहिए ॥२९२।। विशेपार्थ-चूर्णिकारने प्रदेशसत्कर्मके स्वामित्वका वर्णन करते हुए प्रदेशसत्कर्मस्थानोका भी निरूपण किया है, अतएव वे प्रदेशविभक्ति-अधिकारकी समाप्ति करते हुए उसके अन्तमे प्रदेशसत्कर्मस्थानोके वर्णन करनेकी भी सूचना उच्चारणाचार्यों या व्याख्यानाचार्योंको कर रहे है । प्रदेशसत्कर्मस्थानोका वर्णन प्ररूपणा, प्रमाण और अल्पबहुत्वसे किया गया है । कर्मोंके जघन्य प्रदेशसत्कर्मस्थानसे लेकर उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मस्थान तकके सर्व शानोका निरूपण प्ररूपणा-अनुयोगद्वारमे किया गया है। प्रमाण-अनुयोगद्वारमै वतलाया गया है कि प्रत्येक फर्मके प्रदेशसत्कर्मस्थान अनन्त होते हैं। प्रदेशसत्कर्मस्थानोका अल्पवहुत्व पूर्व प्ररूपित उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मके अल्पबहुत्वके समान ही जानना चाहिए । अर्थात् जिस कर्मके प्रदेशाय विशेष अधिक होते हैं, उस कर्मके सत्कर्मस्थान भी विशेप अधिक होते हैं। संख्यातगुणित प्रदेशाग्रवाले कर्मके सत्कर्मस्थान संख्यातगुणित, असंख्यातगुणित प्रदेशाग्रवाले कर्मके सत्कर्मस्थान असंख्यातगुणित और अनन्तगुणित प्रदेशाग्रवाले कर्मके सत्कर्मस्थान अनन्तगुणित हात है। इस प्रकार प्रदेशविभक्ति समाप्त हुई ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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