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________________ २०६ कसाय पाहुड सुत्त [ ५ प्रदेशविभक्ति पदेस संत कम्मं विससाहियं । २०० मायाए उक्कस्सपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । २०१. लोहे उक्कस्सपदेस संतकम्मं विसे साहियं । २०२. जहण्णदंडओ ओघेण सकारणों भणिहिदि । २०३. सव्वत्थोवं सम्मत्ते जहणपदेससंतकम्मं । २०४. सम्मामिच्छत्ते जहण्णपदेस संत कम्ममसंखेज्जगुणं । २०५. केण कारणेण १२०६. सम्पत्ते उच्चेलिलदे सम्मामिच्छत्त' जेण कालेण उन्बेल्लेदि एदम्मि काले एक्कं पि पदेसगुणहाणिट्ठाणंतरं णत्थि एदेण कारणेण । २०७. अनंताणुवंधिमाणे जहण्णपदेस संतकम्ममसंखेज्जगुणं । २०८. कोहे जहण्णपदेस संत कम्मं विसेसाहियं । २०९. मायाए जहण्णपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । २१०. लोभे जहण्णपदेस संतकम्मं विसेसाहियं । २११. मिच्छत्ते जहण्णपदेससंतकम्ममसंखेज्जगुणं । २१२. अपचक्खाणमाणे जहण्णपदेस संतकम्ममसंखेज्जगुणं । २१३. कोहे विशेष अधिक है । संज्वलनमानके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म से संज्वलनक्रोध से उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । संज्वलनक्रोधके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म से संज्वलनमायामे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । संज्वलनमाया के उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म से संज्वलनलोभमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है | १९८-२०१॥ - सम्यक्त्व चूर्णिसू० (० - अब ओधकी अपेक्षा जधन्य अल्पबहुत्वदंंडकको सकारण कहेगेप्रकृतिमे जघन्य प्रदेश सत्कर्म वक्ष्यमाण पदोकी अपेक्षा सबसे कम है । सम्यक्त्व प्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे सम्यग्मिथ्यात्वमे जघन्य प्रदेश सत्कर्म असंख्यातगुणा है । २०२-२०४ ॥ शंकाचू ० - इसका क्या कारण है ? || २०५ || समाधानचू ० - इसका कारण यह है कि सम्यक्त्वप्रकृति के उद्वेलना कर देने पर तदनन्तर जिस कालसे सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना करेगा, उस कालमे एक भी प्रदेशगुणहानिस्थानान्तर नही पाया जाता ॥ २०६॥ चूर्णि सू० - सम्यग्मिथ्यात्व के जघन्य प्रदेशसत्कर्म से अनन्तानुवन्धी-मानकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म असंख्यातगुणा है । अनन्तानुबन्धी- मानकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्म से अनन्तानुबन्धीक्रोधकषायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी- क्रोधकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे अनन्तानुबन्धी- मायाकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है । अनन्तानुबन्धीमायाकपायसे अनन्तानुबन्धी-लोभकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । अनन्तानुवन्धी-लोभकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे मिध्यात्वप्रकृतिमं जघन्य प्रदेशसत्कर्म अमंख्यातगुणा है || २०७-२११॥ चूर्णिसू ० - मिथ्यात्वप्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे अप्रत्याख्यानावरण- मानकपायमै जघन्य प्रदेशसत्कर्म असंख्यातगुणा है । अमलाख्यानावरण- मानकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मने अप्रत्याख्यानावरण- क्रोधकपायमे जयन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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