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________________ गा० २२] उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्ति अल्पवहुत्व-निरूपण १८३. लोभे उस्कस्सपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १८४. अणंताणुवंधिमाणे उक्कस्तपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १८९. कोहे उक्कस्सपदेससंतकरमं विसेसाहियं । १८६. मायाए उक्झस्सपदेससंतकस्मं बिसेसाहियं । १८७. लोभे उक्कस्तपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १८८. मिच्छत्ते उक्कल्सपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १८९. हस्से उक्सस्स. पदेससंतकम्ममणंतगुणं। १९०. रदीए उक्करसपदेमसंतकम्मं विसेसाहियं । १९१. इत्थिवेदे उक्कस्सपदेससंतकस्मं संखेज्जगुणं । १९२. सोगे उक्कस्सपदेससंतसम्म विसेसाहियं । १९३. अरदीए उकस्सपदेससंतकस्मं विसेसाहियं १९४. णयुसयवेदे उक्कस्सपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १९५. दुगुंछाए उकस्तपदेससंतकम विसेसाहियं । १९६. भए उक्झस्सपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १९७. पुरिसवेदे उक्करमपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १९८. माणसंजलणे उक्कस्सपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । १९९. कोहे उवकरसअधिक है । प्रत्याख्यानावरण-मायाकपायके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे प्रत्याख्यानावरण-लोभकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है ॥१८०-१८३॥ चूर्णिमू०-प्रत्याख्यानावरण-लोभकपायके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे अनन्तानुवन्धीमानकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी मानकपायके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे अनन्तानुवन्धी क्रोधकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है। अनन्तातुवन्धी क्रोधकपायके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे अनन्तानुवन्धी मायाकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । अनन्तानुबन्धी मायाकपायके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मल अनन्तानुवन्धी लोभकपायमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है ॥ १८४ १८७॥ चूर्णिसू ०-अनन्तानुवन्धी-लोभकपायके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्ममे मिथ्यात्वप्रकृतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है । मिथ्यात्वप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म ने हास्यप्रकृतिले उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म अनन्तगुणा है। हास्यप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे रतिप्रकृतिसे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विरोप अधिक है । रतिप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे स्त्रीवेदमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसंख्यातगुणा है । स्त्रीवेदके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे शोकप्रकृतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । शोकप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे अरतिप्रकृतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है। अरतिप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे नपुंसकवेदमे उत्कृष्ट प्रशसत्कर्म विशेष अधिक है। नपुंसकवेदक उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मने जुगुप्साप्रकृतिमे उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । जुगुप्साप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे भयप्रकृतिम उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म विनय अधिक है । भयप्रकृतिके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मसे पुरुषवेदमे उत्कृष्ट प्रदेशामत्कर्म विशेष अधिक है ॥१८८-१९७॥ चूर्णिम०-पुरुपवेटके उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मग मम्वलनमानमे उन्ष्ट प्रदंगमर्म
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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