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________________ गा० २२] उत्तरप्रकृतिप्रदेशविभक्ति-अल्पवहुत्व-निरूपण २०७ जहण्णपदससंतकम्मं विसेसाहियं । २१४. मायाए जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २१५. लोभे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २१६. पञ्चक्खाणमाणे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २१७. कोहे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २१८. मायाए जहण्णपदेससंतकम्म विसेसाहियं । २१९. लोभे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २२०, कोहसंजलणे जहण्णपदेससंतकम्ममणंतगुणं । २२१. माणसंजलणे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २२२. पुरिसवेदे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २२३. मायासंजलणे जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २२४. णबुंसयवेदे जहण्णपदेससंतकम्ममसंखेज्जगुणं। २२५. इत्थिवेदस्स जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २२६. हस्से जहण्णपदेससंतकम्ममसंखेज्जगुणं । २२७. रदीए जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । २२८. सोगेजहण्णपदेससंतकम्म संखेज्जगुणं । २२९. अरदीए जहण्णपदेससंतकम्मं विसेसाहियं । क्रोधकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे अप्रत्याख्यानावरण-मायाकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है । अप्रत्याख्यानावरण-मायाकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे अप्रत्याख्यानावरणलोभकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है ॥२१२-२१५॥ चूर्णिसू०-अप्रत्याख्यानावरणलोभके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे प्रत्याख्यानावरणमानकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरण-मानकपायके जघन्य प्रदेशसत्कमसे प्रत्याख्यानावरण-क्रोधकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है। प्रत्याख्यानावरणक्रोधकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे प्रत्याख्यानावरण-मायाकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है । प्रत्याख्यानावरणमायाकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे प्रत्याख्यानावरणलोभकपायमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है ॥२१६-२१९॥ चूर्णिसू०-प्रत्याख्यानावरण-लोभकपायके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे संज्वलनक्रोधमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म अनन्तगुणा है। संज्वलनक्रोधके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे संज्वलनमानमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है। संज्वलनमानके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे पुरुपवेदमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है। पुरुपवेदके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे संज्वलनमायाम जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेप अधिक है। संज्वलनमायाके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे नपुंसकवेदमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म असंख्यातगुणा है ॥२२०-२२४॥ चूर्णिसू०-नपुंसकवेदक जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे स्त्रीवेदमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विशेष अधिक है। स्त्रीवेदके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे हास्यप्रकृतिम जघन्य प्रगसत्कर्म असण्यातगुणा है । हास्यप्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे रतिप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म विरोप अधिक है। रतिप्रकृतिके जघन्यप्रदेशसत्कर्मसे शोकप्रकृतिमे जघन्य प्रदेशसत्कर्म नंग्यातगुणा है। शोकप्रकृतिके जघन्य प्रदेशसत्कर्मसे अरतिप्रकृतिग जघन्य प्रामवर्ग विशेष अधिक। अरनि
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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