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________________ कसायपाहुडसुत्त आर्यमंच और नागहस्ती आर्यमंक्षु और नागहस्ती कर्मसिद्धान्तके महान् वेत्ता और आगमके पारगामी आचार्य हो गये हैं । अभी तक इन दोनों आचार्यों का परिचय और उल्लेख श्वे० परम्पराके आधार पर किया जाता रहा है, किन्तु अब दि० परम्पराके प्रसिद्ध सिद्धान्त ग्रन्थों की धवला-जयधवला टीकाओंके प्रकाशमें आनेसे इन दोनो आचार्य-पुङ्गवोंके विषयमें बहुत कुछ गलतफहमी दूर हुई है और उनके समय-विषयक बहुत कुछ जानकारी प्राप्त हुई है । जयधवलाकार आo वीरसेनने अपनी टीकाके प्रारम्भमे दोनों प्राचार्योंको इस प्रकारसे स्मरण किया है गुणहर-वयण-विणिग्गय-गाहाणत्थो ऽवहारियो सव्वो। जेणज्जमखुणा सो सणागहत्थी वरं देऊ ॥ ७ ॥ जो अज्जमखुसीसो अंतेवासी वि णागहत्थिस्स । सो वित्तिसुत्तकत्ता जइवसहो मे वरं देऊ ।। ८ ॥ अर्थात् जिन आर्यमंतु और नागहस्तीने गुणधराचार्य के मुखकमलसे विनिर्गत (कसायपाहडकी ) गाथाओंके सर्व अर्थको सम्यक् प्रकारसे अवधारण किया, वे हमे वर प्रदान करें । जो आर्यमंलुके शिष्य हैं और नागहस्तीके अन्तेवासी है, वृत्तिसूत्रके कर्ता वे यतिवृषभ मुझे वर प्रदान करें। इस उल्लेखसे तीन बाते फलित होती है १ आर्यमंच और नागहस्ती समकालीन थे। २ दोनो कसायपाहुडके महान् वेत्ता थे । ३ यतिवृषभ दोनोंके शिष्य थे और उन्होने दोनोके पास कसायपाहुडका ज्ञान प्राप्त किया था । यद्यपि आ० यतिवृषभने अपनी प्रस्तुत चूर्णिमें या अन्य किसी ग्रन्थमे अपनेको आर्यमंतु और नागहस्तीके शिष्य रूपमें उल्लेखित नहीं किया है और न अन्य किसी आचार्यका ही अपनेको शिष्य बतलाया है, तथापि जिस प्रकारसे कुछ सैद्धान्तिक विशिष्ट स्थलों पर उन्होंने 'एत्थ वे उवएसा' कहकर जिन दो उपदेशोंकी सूचना की है, उनसे इतना अवश्य स्पष्ट ज्ञात होता है कि उन्होंने अपने समयके दो महान् ज्ञानी गुरुओंसे विशिष्ट उपदेश अवश्य प्राप्त किया था। और इसलिए जयधवलाकार वीरसेनने जो उन्हे आर्यमंक्षुका शिष्य और नागहस्तीके अन्तेवासी होनेका उल्लेख किया है, उसमे सन्देहके लिए कोई स्थान नहीं रहता। नन्दिसूत्रकी पट्टावलीमे आर्यमंक्षुका परिचय इस प्रकार दिया गया है भणगं करगं झणगं पभावगं णाण-दसणगुणाणं । वंदामि अञ्जमंगु सुयसागरपारगं धीरं ।। २८ ॥ अर्थात् जो कालिक आदि सूत्रोंके अर्थ-व्याख्याता हैं, साधुपदोचित क्रिया कलापके कराने वाले हैं, धर्मध्यानके ध्याता या विशिष्ट अभ्यासी है, ज्ञान और दर्शन गुणके महान प्रभावक हैं, धीर-वीर हैं अर्थात् परीपह और उपसर्गाके सहन करनेवाले है और श्रुतसागरके पारगामी हैं, ऐसे आर्यमंगु या आर्यमञ्ज आचार्यको मैं वन्दना करता हूँ। श्व० पट्टावलीमे इन्हें आर्यसमुद्रका शिष्य बतलाया गया है। उक्त पट्टावलीमें प्रार्थनागहस्तीका परिचय इस प्रकार पाया जाता है पुरणो तेसि दोण्ह पि पादमूले असीदिसदगाहाण गुणहरमुहकमलविरिणग्गयाणमत्य सम्म सोऊप पयिवसहभटारएण पवयवच्छलेण चुपिणसुत्त कय । जयघ० भा० १ पृ० ८८ ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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