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________________ प्रस्तावना दंसणमोहक्खवणापट्टो कम्मभूमिजादो दु । शियमा म सगदीए बिगो चावि सव्वत्थ ॥ ( कसाय० गा० ११० ) ७ दंसणमोहणीयं कम्मं खवेदु माढवेंतो कहि वेद १ अड्ढाइज्जेसु दीवजिया केवली तित्थयरा तम्हि आढवेदि समुद्देसु पएणारसकम्मभूमीसु जम्हि पुरा चदुसु वि गदीसु || १२ || ट्टि गिट्ठवेदि ॥ १३ ॥ ( षट्खंडा० पु० ६ सम्य० चू० ) पाठक इस तुलनासे स्वयं ही यह अनुभव करेंगे कि कसायपाहुडकी गाथासूत्रोंके बीजपदोकी षट्खंडागम-सूत्र में भाष्यरूप विभाषा की गई है । उक्त तुलनासे यह स्पष्ट है कि पुष्पदन्त और भूतबलिरचित षट्खंडागमसूत्रों की रचना कसायपाहुडसे पीछेकी है और उसपर कसायपाहुडका स्पष्ट प्रभाव है इसीसे इन दोनोंका तथा उनके गुरु धरसेनाचार्यका आ० गुणधरसे उत्तरकालवर्ती होना सिद्ध है । गुणधर और शिवशर्म आ० शिवशर्मके कम्मपयडी और सतक नामक दो ग्रन्थ आज उपलब्ध हैं । इन दोनों ही ग्रन्थोंका उद्गमस्थान महाकम्मपय डिपाहुड है, इससे वे द्वितीय पूर्वके एकदेश ज्ञाता सिद्ध होते हैं । कम्मपयडीके साथ जब हम कसायपाहुडकी तुलना करते हैं तब दोनोमें हमें एक मौलिक अन्तर दृष्टिगोचर होता है और वह यह कि कम्मपथडीमे महाकम्मपय डिपाहुडके २४ अनुयोगद्वारोंका नहीं, किन्तु बन्धन, उदय, संक्रमणादि कुछ अनुयोगद्वारों से सम्बन्ध रखने वाले विषयोंका प्रतिपादन किया गया है, जबकि कसायपाहुडमें पूरे पेज्जदोसपाहुडका उपसंहार किया गया है । इस प्रकार कम्मपयडीके रचयिता उस समय हुए सिद्ध होते हैं - जबकि महाकम्मपयडिपाहुडका बहुत कुछ अश विच्छिन्न हो चुका था । और यही कारण है कि कम्प सतक, इन दोनों ही ग्रन्थों के अन्त मे अपनी अल्पज्ञता प्रकट करते हुए उन्होंने दृष्टिवादके ज्ञाता आचार्यों से उसे शुद्ध करनेकी प्रार्थना की है । पर कसायपाहुडके अन्त में ऐसी कोई बात नहीं पाई जाती जिससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि उसके कर्ता उस विषय के पूर्ण ज्ञानी थे । दूसरी बात जो तुलनासे हृदय पर अकित होती है, वह यह है कि कम्मपयडी एक संग्रह ग्रन्थ है | क्योंकि उसमे अनेकों प्राचीन गाथाएं यथास्थान दृष्टिगोचर होती हैं, जिससे कि उसके सग्रह-ग्रन्थ होनेकी पुष्टि होती है । स्वय कम्मपयडीकी चूर्णिमें उसके कर्त्ताने उसे कम्मपयडी-संग्रहणी नाम दिया है और सतकचूर्णि में भी इसी नामसे अनेक उल्लेख देखनेको मिलते है जोकि उसके सग्रहत्व के सूचक हैं। पर कसायपाहुडकी रचना मौलिक है यह बात उसके किसी भी अभ्यासींसे छिपी नहीं रह सकती । और उसका कम्मपयडी दिसे पूर्वमें रचा जाना तो असंदिग्धरूपसे सिद्ध है । यही कारण है कि कम्मपयडीके संक्रमकरण में कसायपाहुडके संक्रमअर्थाधिकारकी १३ गाथाए साधारण से पाठ भेद के साथ अनुक्रमसे ज्यों की त्यों पाई जाती हैं । कसायपाहुडमें उनका गाथा क्रमाङ्क २७ से ३६ तक है और कम्मपयडीके संक्रम अधिकार में उनका क्रमाङ्क १० लेकर २२ तक है। इसके अतिरिक्त कम्मपयडीके उपशमनाकरणमें कसायपाहुडके दर्शनमोहोपशमना अर्थाधिकारकी चार गाथाएं कुछ पाठभेदके साथ पाई जाती हैं। कसायपाहुडमें उनका क्रमाङ्क १००, १०३, १०४ और १०५ है और कम्मपयडीके उपशमनाकरणमे उनका क्रमाङ्क २३ से २६ तक है। इससे भी कसायपाहुडकी प्राचीनता और कम्मपयडीकी संग्रहणीयता सिद्ध होती है ।
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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