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________________ कसायपाहुडसुत्त ऐसा अवश्य प्रतीत होता है कि पखंडागमकी रचना पर कसायपाहुडका प्रभाव अवश्य रहा है। यहां पर उस प्रभावकी कुछ चर्चा करना अनावश्यक न होगा। _ कसायपाहुडमे सम्यक्त्वनामक अर्थाधिकारके भीतर दर्शनमोह-उपशामना और दर्शनमोह-क्षपणा नामक दो अनुयोगद्वार हैं। उनके प्रारम्भमें इस बातका विचार किया गया है कि कर्मोंकी कैसी स्थिति आदिके होनेपर जीव दर्शनमोहका उपशम, क्षय या क्षयोपशम करनेके लिए प्रस्तुत होता है। इस प्रकरणकी गाथा नं० ६२ के द्वितीय चरण 'के वा अंसे निबंधदि' द्वारा यह पृच्छा की गई है कि दर्शनमोहके उपशमनको करनेवाला जीव कौन-कौन कर्म-प्रकृतियोंका वन्ध करता है ? आ० गुणधरकी इस पृच्छाका प्रभाव हम पट्खंडागमकी जीवस्थानचूलिकाके अन्तर्गत तीन महादंडक चूलिकासूत्रोंमें पाते हैं, जहां पर कि स्पष्ट रूपसे कहा गया है "इदाणि पढमसम्मत्ताहिमुहो जाओ पयडीओ बंधदि, ताओ पयडीओ कित्तइस्सामो।" (षटखं. पु०६प्रथम महादंडकचलिका सूत्र १) अर्थात् प्रथमोपशमसम्यक्त्वके अभिमुख हुआ जीव जिन प्रकृतियोंको बांधता है, उन प्रकृतियोंको कहते हैं। इस प्रकारसे प्रतिज्ञा करनेके अनन्तर आगेके तीन महादंडकसूत्रोंके द्वारा उन प्रकृतियोंका नाम-निर्देश किया गया है। इससे श्रागे कसायपाहुडकी गाथा नं०६४ के 'ओवट्ट दूण सेसाणि कं ठाणं पडिवज्जदि' इस पृच्छाका प्रभाव सम्यक्त्वोत्पत्तिचूलिकाके निम्न सूत्र पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है, जिसमें कि उक्त पृच्छाका उत्तर दिया गया है___ "श्रोहट्टदूण मिच्छत्तं तिषिण भागं करेदि सम्मत्तं मिच्छत्तं सम्मामिच्छत्तं ।” (षट्वं० पु०६ सम्य० सूत्र ७) - अब इससे आगेकी गाथा नं०६४ का मिलान उसी सम्यक्त्वचूलिकाके सूत्र नं०६ से कीजिए उवसामेंतो कम्हि उवसामेदि ? चदुसु वि गदीसु उवसामेदि । चदुसु वि गदीसु उवसातो पंचिदिएसु उवसामेदि, णो दंसणमोहस्सुवसामगो दु एइंदिय-विगलिदिएसु। पंचिदिएसु उवचदुसु वि गदीसु वोद्धव्यो। सामेंतो सगणीसु उवसामेदि, णो असरणीपंचिदियो य सरणी सु । सगणीसु उवसातो गठभोवक्कंणियमा सो होइ पज्जत्तो॥ तिएसु उवसामेदि, णो सम्मुच्छिमेसु । (कसाय० गा०६४) गम्भोवक्कंतिएसु उवसातो पज्जचएसु उवसामेदि, णो अपज्जत्तएसु । पज्जत्तएसु उवसातो संखेज्जवस्साउगेसु वि उवसामेदि, असंखेज्जवस्साउगेसु वि । (पटखं० पु० ६ सम्म० चू० सू०६) इसी प्रकार दर्शनमोहक्षपणा-सम्बन्धी गाथा नं० ११० का भी मिलान इसी चूलिकाके सूत्र नं० १२और १३ से कीजिए
SR No.010396
Book TitleKasaya Pahuda Sutta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Jain
PublisherVeer Shasan Sangh Calcutta
Publication Year1955
Total Pages1043
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size71 MB
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